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झारखंड हाईकोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) के तहत आदिवासी जमीन की बहाली (रिस्टोरेशन) से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की कोर्ट ने कहा कि कानून में भले ही स्पष्ट समय-सीमा न हो, लेकिन आदिवासी जमीन हस्तांतरण को चुनौती देने का अधिकार अनिश्चितकाल तक नहीं रह सकता। अगर किसी मामले का पहले ही निपटारा हो चुका है और उस आदेश को समय पर चुनौती नहीं दी गई है तो वर्षों बाद उसी विवाद को दोबारा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कार्रवाई उचित समय-सीमा के अंदर ही होनी चाहिए। कोर्ट ने चान्हो निवासी अमर कुमार चौधरी की याचिका स्वीकारते हुए यह आदेश दिया। साथ ही दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडलीय आयुक्त व अपर समाहर्ता के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें करीब 20 साल बाद दोबारा दाखिल एसएआर (शेड्यूल एरिया रेगुलेशन) मामले के आधार पर पहले के आदेश को पलट दिया गया था। देश की आजादी के समय शुरू हुआ विवाद, केस जीतने के बाद फिर हुआ केस
यह विवाद चान्हो के खाता संख्या-41, प्लॉट संख्या-610 की 1.32 एकड़ जमीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता अमर कुमार चौधरी के अनुसार उसके पिता ने वर्ष 1947 में यह जमीन 2,500 रुपए में खरीदी थी और तब से कब्जे में थी। वर्ष 1962 में विवाद होने पर टाइटल सूट दायर हुआ, जिसका 1965 में समझौते के आधार पर निपटारा हो गया। इसके बाद 1986-87 में पहली बार एसएआर केस दायर हुआ। उस समय एसएआर अधिकारी ने समझौते और सीएनटी एक्ट के प्रावधानों को देखते हुए समान क्षेत्रफल की दूसरी जमीन आदिवासी रैयत के पक्ष में रजिस्ट्री कराने का आदेश दिया। आदेश का पालन हुआ, रजिस्ट्री हुई और म्यूटेशन भी कर दिया गया। तब इस आदेश को किसी ने चुनौती नहीं दी। वर्ष 2006 में उसी जमीन को लेकर दोबारा एसएआर केस दायर किया गया। एसएआर अधिकारी ने इसे पहले ही तय हो चुके विवाद (रेस जुडीकाटा) का मामला मानते हुए खारिज कर दिया, लेकिन अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकार ने पुराने आदेश को पलट दिया। इसी के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर हाईकोर्ट ने दी राहत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के सीटू साहू और फूलचंद मुंडा के मामले का हवाला दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि सीएनटी एक्ट की धारा 71-ए में भले ही स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित नहीं है, लेकिन बहाली की कार्रवाई उचित अवधि में होनी चाहिए। दशकों पुराने मामलों को बिना ठोस आधार के दोबारा खोलना कानून की मंशा के विपरीत है। वर्ष 1988 का आदेश अंतिम रूप ले चुका था। उसके खिलाफ न तो समय पर कोई चुनौती दी गई और न ही बाद में ऐसा कोई नया तथ्य सामने आया, जिससे उसी विवाद को फिर से खोला जा सके। कोर्ट ने पाया कि 2006 का दूसरा एसएआर केस कंस्ट्रक्टिव रेस जुडीकाटा और अनुचित विलंब से प्रभावित था। कोर्ट ने कहा कि अपीलीय और पुनरीक्षण अधिकारियों ने यह मान लिया कि जमीन पर कोई स्थायी संरचना नहीं थी, जबकि गवाहों के बयान इसके विपरीत थे। सरकार भी ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सकी, जिससे उनके निष्कर्ष सही साबित हो सकें। मुआवजे के बाद भी दर्ज करा देते हैं केस, अब लगेगी रोक
“राज्य में हजारों ऐसे मामले हैं, जिसमें एसएआर कोर्ट फैसला सुना चुका है। रैयत के वंशज मुआवजा ले लेते हैं, इसके बावजूद दूसरे पक्ष के खिलाफ एसएआर कोर्ट में केस दर्ज करा देते हैं। केस दर्ज होने के बाद एसएआर कोर्ट से लेकर विभिन्न वर्गों द्वारा कई बार दूसरे पक्ष का भयादोहन किया जाता है। इस फैसले से ऐसे मामलों पर रोक लगेगी।” कोर्ट के फैसले का असर क्या
अनावश्यक मुकदमों पर रोक: इस फैसले से उन मामलों में कमी आएगी, जहां दशकों पुराने सुलझ चुके जमीन विवादों को दोबारा कोर्ट में खींच लिया जाता है।
खरीदारों को सुरक्षा: सीएनटी एक्ट के तहत जमीन लेने वाले उन लोगों को राहत मिलेगी, जिनके पास दशकों पुराना वैध अदालती आदेश मौजूद है, क्योंकि उन आदेशों को अचानक चुनौती नहीं दी जा सकेगी।
राजस्व अदालतों के लिए गाइडलाइन: राजस्व अदालतों को बहुत पुराने मामलों को दोबारा खोलने की अनुमति देने से पहले इसका ध्यान रखना होगा।
