
Supaul Fire Incident: सुपौल. आग की लपटें तेजी से घरों को निगल रही थीं. परिवार के लोग अपनी आंखों के सामने जीवनभर की कमाई को राख होते देख रहे थे. किसी को अनाज बचाने की चिंता थी, तो कोई नकदी और जरूरी सामान निकालने की कोशिश कर रहा था. लेकिन आग पर काबू पाने के लिए जिस दमकल की जरूरत थी, उसके रास्ते में थलहा धार पर पुल नहीं होने की बाधा थी. नतीजा यह हुआ कि दमकल की गाड़ी को गांव तक पहुंचने के लिए करीब 22 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ी. जब तक मदद पहुंची, तब तक करीब 30 घर जलकर राख हो चुके थे.
सुपौल के बैरिया चौधरी गांव में मंगलवार की रात हुई इस भीषण अगलगी ने 13 परिवारों को बेघर कर दिया. हादसे में करीब 30 वर्षीय गणेश पासवान गंभीर रूप से झुलस गए. उनका इलाज एक निजी अस्पताल में चल रहा है. शुरुआती अनुमान के मुताबिक, आग में 40 लाख रुपये से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ है. इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर थलहा धार पर पुल नहीं होने की कीमत गांव के लोगों को कब तक चुकानी पड़ेगी.
रात 11:30 बजे लगी आग, देखते ही देखते राख हो गए 30 घर
घटना बसंतपुर अंचल की कोचगामा पंचायत के बैरिया चौधरी गांव के वार्ड संख्या 14 की है. मंगलवार की रात करीब 11:30 बजे अचानक आग लग गई. रात का सन्नाटा चीख-पुकार और अफरा-तफरी में बदल गया. देखते ही देखते आग ने आसपास के घरों को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया.
आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को घरों से सामान निकालने का मौका तक नहीं मिला. परिवार के सदस्य किसी तरह अपनी जान बचाकर बाहर निकले, लेकिन घरों में रखे अनाज, कपड़े, बर्तन, नकदी और अन्य जरूरी सामान आग में जल गए. कई परिवारों की बकरियां भी नहीं बच सकीं.
इस हादसे में एक परिवार का सिलाई का सामान भी जल गया. सिलाई ही उसकी रोजी-रोटी का सहारा थी. अब घर के साथ कमाई का जरिया भी खत्म हो गया है. ग्रामीणों ने बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने की आशंका जताई है. हालांकि, आग लगने के वास्तविक कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
फाइनेंस कंपनी से लिया था 50 हजार का कर्ज, नकदी भी जल गई
आग से प्रभावित परिवारों की परेशानी सिर्फ घर और सामान के नुकसान तक सीमित नहीं है. पीड़ित महिलाओं के मुताबिक, उन्होंने एक निजी फाइनेंस कंपनी से 50 हजार रुपये का कर्ज लिया था. यह रकम घरेलू जरूरतों और कामकाज के लिए घर में रखी गई थी, लेकिन आग में नकदी भी जल गई.
अब उनके सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ परिवार के लिए भोजन और रहने की व्यवस्था करनी है, दूसरी तरफ कर्ज चुकाने की चिंता भी है. घरों के साथ कपड़े, अनाज और रोजमर्रा की जरूरत का सामान नष्ट हो जाने से प्रभावित परिवारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं.
जिन लोगों ने वर्षों की मेहनत से अपना आशियाना बनाया था, उन्हें अब फिर से जिंदगी शुरू करने की चिंता सता रही है. बच्चों की परवरिश, भोजन और सिर छिपाने की जगह का इंतजाम करना उनके लिए सबसे बड़ी जरूरत बन गया है.
थलहा धार पर पुल होता, तो 22 किमी घूमने की नौबत नहीं आती
इस अगलगी में सबसे बड़ा सवाल आपातकालीन सेवाओं की पहुंच को लेकर उठ रहा है. ग्रामीणों के अनुसार, आग लगने की सूचना अग्निशमन विभाग, वीरपुर को दी गई थी. लेकिन थलहा धार पर पुल नहीं होने के कारण दमकल की गाड़ी को गांव तक पहुंचने के लिए करीब 22 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ी.
ग्रामीणों का आरोप है कि दमकल के देर से पहुंचने के कारण आग पर समय रहते काबू पाना मुश्किल हो गया. तब तक आग कई घरों को अपनी चपेट में ले चुकी थी. गांव के लोगों ने खुद एकजुट होकर आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन लपटें इतनी तेज थीं कि उनके प्रयास पर्याप्त साबित नहीं हुए.
ग्रामीणों ने दमकल की गाड़ी में पानी की मात्रा पर भी नाराजगी जताई. उनका कहना है कि देर से पहुंची छोटी दमकल गाड़ी में महज 300 लीटर पानी था, जो इतनी बड़ी आग बुझाने के लिए पर्याप्त नहीं था.
हालांकि, दमकल के पहुंचने में देरी और आग से हुए नुकसान के बीच सटीक संबंध का आधिकारिक आकलन सामने नहीं आया है. फिर भी, इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गांव तक पहुंचने वाले रास्ते और पर्याप्त आपातकालीन संसाधनों की उपलब्धता कितनी महत्वपूर्ण है.
आजादी के बाद से पुल का इंतजार, बांस की चचरी के सहारे आवागमन
ग्रामीणों का कहना है कि थलहा धार पर आजादी के बाद से अब तक पुल का निर्माण नहीं हो सका है. धार के कारण कोचगामा पंचायत दो हिस्सों में बंटी हुई है. एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक आने-जाने के लिए लोगों को बीच धार में बनी बांस की चचरी का सहारा लेना पड़ता है.
यह समस्या सिर्फ रोजमर्रा के आवागमन तक सीमित नहीं है. पुल नहीं होने से गांव में दमकल, एंबुलेंस और अन्य जरूरी सेवाओं की पहुंच भी प्रभावित हो सकती है. आगजनी, दुर्घटना या किसी मरीज की गंभीर स्थिति में रास्ते की यह बाधा लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है.
बैरिया चौधरी की घटना ने विकास के दावों और ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतों के बीच की दूरी को सामने ला दिया है. ग्रामीणों का सवाल है कि जब एक पुल के अभाव में दमकल को 22 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है, तो आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी.
अब ग्रामीण प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से थलहा धार पर जल्द पुल निर्माण कराने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी दूसरे परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना नहीं करना पड़े.
सीओ पहुंचे गांव, प्लास्टिक शीट और मुआवजे का आश्वासन
अगलगी की जानकारी मिलने के बाद बसंतपुर के अंचलाधिकारी ब्रजेश कुमार सिंह मौके पर पहुंचे. उन्होंने प्रभावित परिवारों की स्थिति का जायजा लिया और तत्काल प्लास्टिक शीट उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया. साथ ही सरकारी प्रावधानों के तहत नियमानुसार मुआवजा देने की बात कही.
फिलहाल प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत सामग्री, भोजन और रहने की व्यवस्था की जरूरत है. प्रशासन के सामने चुनौती है कि पीड़ितों तक जल्द सहायता पहुंचे और सरकारी प्रावधानों के अनुसार नुकसान का आकलन कर मुआवजे की प्रक्रिया पूरी की जाए.
इसके साथ ही थलहा धार पर पुल निर्माण की मांग पर भी ठोस पहल जरूरी है. राहत और मुआवजा प्रभावित परिवारों को तत्काल सहारा दे सकते हैं, लेकिन आवागमन की समस्या का स्थायी समाधान ही भविष्य में ऐसी आपात स्थितियों में मदद पहुंचाने की राह आसान कर सकता है.
Supaul Fire Incident: इन 13 परिवारों को हुआ नुकसान
इस भीषण अगलगी में कलानंद पासवान, पिता स्व. मोहन पासवान, संतोष पासवान, महेश पासवान, गणेश पासवान, गुलाब चंद पासवान, मसो कोशिया देवी, रामचंद्र पासवान, बुधन पासवान, रामशीष पासवान, नीतीश पासवान, फुदन पासवान, सकल देव पासवान और प्रमोद पासवान के परिवार प्रभावित हुए हैं.
करीब 30 घरों के जलने से इन परिवारों के सामने रहने और खाने-पीने का संकट खड़ा हो गया है. गांव में अब पीड़ितों को राहत मिलने की उम्मीद है. वहीं, थलहा धार पर पुल निर्माण की मांग एक बार फिर तेज हो गई है.
बैरिया चौधरी की यह घटना सिर्फ आग से हुए नुकसान की कहानी नहीं है. यह उस बुनियादी सुविधा की कमी का भी सवाल है, जिसका असर संकट के समय सीधे लोगों की जान-माल की सुरक्षा पर पड़ सकता है. अब देखना है कि प्रशासन तत्काल राहत देने के साथ पुल निर्माण की वर्षों पुरानी मांग पर क्या कदम उठाता है.
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