महेंद्र साव | धालभूमगढ़ पूर्वी सिंहभूम जिले के धालभूमगढ़ के चोयरा निवासी समाजसेवी भूतेष पंडित ने अपनी सात एकड़ जमीन पर फलों का बड़ा बागान तैयार किया है। वे राजनीति और समाजसेवा की व्यस्तता के बीच भी बागवानी का शौक निभाते हैं। बागान की खास बात यह है कि भूतेष पंडित यहां के कीमती और रसीले फल बाजार में नहीं बेचते। उनका कहना है कि बागान व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं लगाया। शौक और पर्यावरण प्रेम इसकी वजह है। बागान में आने वाला हर अतिथि, मित्र या राहगीर खाली हाथ नहीं लौटता। वे ताजे फल भेंट करके विदा करते हैं। करीब पांच साल पहले उन्होंने बागान की शुरुआत की थी। 200 से अधिक आम के पौधे लगाए थे। अब ये पौधे घने पेड़ बन चुके हैं। इस सीजन में छोटे-छोटे पेड़ों पर आम के गुच्छे इतने लदे हैं कि शाखाएं झुककर मिट्टी को छू रही हैं। बागान में दुनिया का सबसे महंगा माना जाने वाला मियाजाकी आम भी है। अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा, हेमसागर, मल्लिका समेत दर्जनों किस्में हैं। यहां बारहमासी आम के पेड़ भी हैं। इनमें सालभर आम फलते हैं। आम के साथ अमरूद की कई किस्में भी हैं। सबसे अलग बैंगनी अमरूद है। इसकी पत्तियां, डालियां, फल गहरे बैंगनी और कत्थई रंग के होते हैं। इलाहाबादी अमरूद और देसी किस्मों के पेड़ों पर भी भारी मात्रा में फल आए हैं। करीब दो साल पहले वे मालदा की नर्सरी से जामरुल वाटर एप्पल के दो पौधे लाए थे। अब उन पेड़ों पर प्रचुर मात्रा में जामरुल लगे हैं। बागान में मीठी इमली, नींबू, कई प्रजातियों के कटहल, नारियल, जामुन, बेर, बेल, पपीता जैसे फलदार पेड़ भी हैं। बागान के बीचोंबीच ठहरने के लिए भवन और आलीशान फार्म हाउस बनाया गया है। शांत माहौल और फलों की खुशबू के कारण यह वीआईपी लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना है। हर साल जमशेदपुर के प्रसिद्ध अस्पताल टीएमएच के डॉक्टरों की टीम परिवार के साथ यहां पिकनिक मनाने आती है। धालभूमगढ़ और आसपास से आने वाले लोग उनके इस प्रयास, मेहनत और फलों को मुफ्त बांटने की परंपरा की तारीफ करते हैं। बागान में फल दिखाते भूतेष पंडित।
धालभूमगढ़ के चोयरा में सात एकड़ में फलों का साम्राज्य, बाजार में नहीं बेचते फल
महेंद्र साव | धालभूमगढ़ पूर्वी सिंहभूम जिले के धालभूमगढ़ के चोयरा निवासी समाजसेवी भूतेष पंडित ने अपनी सात एकड़ जमीन पर फलों का बड़ा बागान तैयार किया है। वे राजनीति और समाजसेवा की व्यस्तता के बीच भी बागवानी का शौक निभाते हैं। बागान की खास बात यह है कि भूतेष पंडित यहां के कीमती और रसीले फल बाजार में नहीं बेचते। उनका कहना है कि बागान व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं लगाया। शौक और पर्यावरण प्रेम इसकी वजह है। बागान में आने वाला हर अतिथि, मित्र या राहगीर खाली हाथ नहीं लौटता। वे ताजे फल भेंट करके विदा करते हैं। करीब पांच साल पहले उन्होंने बागान की शुरुआत की थी। 200 से अधिक आम के पौधे लगाए थे। अब ये पौधे घने पेड़ बन चुके हैं। इस सीजन में छोटे-छोटे पेड़ों पर आम के गुच्छे इतने लदे हैं कि शाखाएं झुककर मिट्टी को छू रही हैं। बागान में दुनिया का सबसे महंगा माना जाने वाला मियाजाकी आम भी है। अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा, हेमसागर, मल्लिका समेत दर्जनों किस्में हैं। यहां बारहमासी आम के पेड़ भी हैं। इनमें सालभर आम फलते हैं। आम के साथ अमरूद की कई किस्में भी हैं। सबसे अलग बैंगनी अमरूद है। इसकी पत्तियां, डालियां, फल गहरे बैंगनी और कत्थई रंग के होते हैं। इलाहाबादी अमरूद और देसी किस्मों के पेड़ों पर भी भारी मात्रा में फल आए हैं। करीब दो साल पहले वे मालदा की नर्सरी से जामरुल वाटर एप्पल के दो पौधे लाए थे। अब उन पेड़ों पर प्रचुर मात्रा में जामरुल लगे हैं। बागान में मीठी इमली, नींबू, कई प्रजातियों के कटहल, नारियल, जामुन, बेर, बेल, पपीता जैसे फलदार पेड़ भी हैं। बागान के बीचोंबीच ठहरने के लिए भवन और आलीशान फार्म हाउस बनाया गया है। शांत माहौल और फलों की खुशबू के कारण यह वीआईपी लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना है। हर साल जमशेदपुर के प्रसिद्ध अस्पताल टीएमएच के डॉक्टरों की टीम परिवार के साथ यहां पिकनिक मनाने आती है। धालभूमगढ़ और आसपास से आने वाले लोग उनके इस प्रयास, मेहनत और फलों को मुफ्त बांटने की परंपरा की तारीफ करते हैं। बागान में फल दिखाते भूतेष पंडित।
