Tuesday, June 30, 2026

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रांची का चिरूडीह बना 'ग्लोबल आर्ट विलेज':सोहराई कला से सजी हैं घरों की दीवारें, फ्रांस, कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन से पहुंच रहे पर्यटक


झारखंड की पारंपरिक सोहराई कला कभी गांवों की दीवारों में सिमटती जा रही थी। रांची जिले के तमाड़ प्रखंड के चिरूडीह गांव में उपजी सोच ने न सिर्फ इस कला को नई पहचान दी, बल्कि 100 से ज्यादा महिलाओं और युवाओं की जिंदगी भी बदल दी। चिरूडीह के युवा कलाकार मनीष कुमार महतो ने अपनी मां और दो दोस्तों पुष्कर महतो और पवन मुंडा के साथ मिलकर अप्रैल 2024 में गांव में वर्कशॉप की। इसमें 35 महिलाओं को दोबारा सोहराई कला का इस्तेमाल करने को कहा गया। आज चिरूडीह के 120 घरों में से करीब 50 घरों की दीवारें सोहराई कला से सजी हैं। गांव की पहचान अब ‘ग्लोबल आर्ट विलेज’ की हो गई है। फ्रांस, कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं। तस्वीरों में देखें ग्लोबल आर्ट विलेज…. 300-400 की साड़ियां पेंटिंग के बाद 6-7 हजार में बिक रहीं मनीष ने अपने पिता की याद में गांव में कला सदन सह संग्रहालय बनाया है। यहां नई पीढ़ी को फ्री ट्रेनिंग मिलती है। गांव की लड़कियां साड़ियों और गमछों पर सोहराई चित्रकारी कर रही हैं। 300-400 रुपए की साड़ियां पेंटिंग के बाद 7-8 हजार रुपए तक में बिक रही हैं। इससे कई युवतियां हर महीने 8 से 9 हजार रुपए तक कमा रही हैं। ये महिलाएं अब दूसरों को ट्रेनिंग दे रही हैं। वे धनबाद, कोलकाता जैसे शहरों में वर्कशॉप लेकर सोहराई कला सिखा रही हैं। इसके लिए उन्हें रोज 500 से 1000 रुपए तक का मानदेय मिलता है। आसपास के दूसरे गांव भी सजा रहे घरों की दीवारें गांव में फोटो शूट, वीडियो और रील बनाने आने वाले पर्यटक भी स्थानीय कलाकारों को अतिरिक्त आय का अवसर दे रहे हैं। चिरूडीह की सफलता का असर आसपास के गांवों में भी दिखाई देने लगा है। पड़ोसी गांव सिंदवारी और पिरगालडीह जैसे गांवों के लोग भी अब अपनी दीवारों को सोहराई कला से सजाने लगे हैं। कई घरों की दीवारों को मनीष और उनकी टीम की मदद से सजाया गया है। सोहराई कला से बदली जिंदगी और गांव की सूरत सोहराई कला की आर्टिस्ट काजल महतो कहती हैं कि मुझे कला या पेंटिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। 2024 में मैंने सोहराई पेंटिंग सीखनी शुरू की। फिर पेंटिंग के ऑर्डर मिलने लगे। मैंने फोक फेस्टिवल, कोलकाता में हिस्सा लिया। धनबाद में बच्चों को सोहराई कला सिखाने भी गई। आज मैं साड़ी, गमछा और ब्लाउज पर भी सोहराई पेंटिंग कर रही हूं। इस कला ने मुझे पहचान, सम्मान और आत्मविश्वास दिया है। पैसे मिल रहे हैं तो जीवन स्तर भी सुधरा है। गांव की हालत भी बदल गई है।

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