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बेतिया के मीना बाजार और छोटा रमना स्थित खास महल बंदोबस्ती के दुकानदारों ने जिला प्रशासन द्वारा जारी अतिक्रमण नोटिस का कड़ा विरोध किया है। व्यवसायी दुकानदार संघ ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता आयोजित कर इन नोटिसों को तत्काल वापस लेने की मांग की। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि बंदोबस्तीधारी दुकानदारों को बेदखल करने की कार्रवाई की गई, तो वे आत्मदाह जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी। 85 दुकानदारों को अतिक्रमणकारी नोटिस संघ के संरक्षक पारस लाल विश्वकर्मा, उपाध्यक्ष धर्मेश कुमार और सचिव रिंकू कनौजिया ने बताया कि वे और उनके पूर्वज महारानी जानकी कुंवर के समय से बेतिया मौजा की भूमि पर व्यवसाय करते आ रहे हैं। यह भूमि नगर परिषद थाना संख्या-128, खाता संख्या-0 तथा खेसरा संख्या-8301 एवं 8302 के अंतर्गत आती है। उस समय दुकानें दैनिक कौड़ी या ठेकेदारी रसीद के आधार पर किराए पर संचालित होती थीं। दुकानदारों का कहना है कि जिला प्रशासन ने 85 दुकानदारों को अतिक्रमणकारी बताते हुए नोटिस जारी किए हैं, जबकि वे सभी विधिवत बंदोबस्तीधारी हैं। जमींदारी उन्मूलन के बाद भूमि सरकार के अधीन पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जमींदारी उन्मूलन के बाद संबंधित भूमि बिहार सरकार के अधीन आ गई थी। इसके उपरांत, भूमिहीन दुकानदारों के पुनर्वास और उनकी आजीविका सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बिहार खास महल बंदोबस्ती अधिनियम, 1953 के तहत इन दुकानों की बंदोबस्ती की गई थी। वर्ष 1961 से सभी बंदोबस्तीधारी नियमित रूप से सरकार को लगान का भुगतान करते आ रहे हैं। उनका दावा है कि इसकी पुष्टि बिहार भूमि पोर्टल पर उपलब्ध जमाबंदी रजिस्टर-2 और अपर समाहर्ता कार्यालय में सुरक्षित खास महल बंदोबस्ती अभिलेखों से की जा सकती है। अधिनियम 1956 के तहत नोटिस विधिसम्मत नहीं दुकानदारों का कहना है कि बिहार सार्वजनिक भूमि अतिक्रमण अधिनियम, 1956 के तहत उन्हें नोटिस जारी करना विधिसम्मत नहीं है, क्योंकि बंदोबस्ती की गई भूमि सार्वजनिक अतिक्रमण की श्रेणी में नहीं आती। उनका कहना है कि यदि किसी सार्वजनिक परियोजना के लिए सरकार को भूमि की आवश्यकता है तो बिहार खास महल बंदोबस्ती अधिनियम, 1953 की धारा 21 एवं 22 के तहत विधिसम्मत अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। जिला प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग
संघ के पदाधिकारियों ने यह भी कहा कि यदि कानूनी प्रावधानों और उपलब्ध अभिलेखों की अनदेखी करते हुए पक्की दुकानों को तोड़ा गया या दुकानदारों को बलपूर्वक बेदखल किया गया, तो उससे होने वाले आर्थिक और सामाजिक नुकसान की पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी। उन्होंने सरकार और जिला प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच कर कानून के अनुरूप निर्णय लेने तथा बंदोबस्तीधारी दुकानदारों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।
