Monday, August 31, 2026

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अनाथ तीन बच्चों को मिला 14 लाख का पक्का मकान:मां-पिता की मौत के बाद टूटे घर में रह रहे थे, वीडियो वायरल होने पर संत रामपाल ने की मदद


नवादा में एक घर ऐसा भी था, जहां चूल्हा ठंडा था और तीन मासूम भाई भविष्य को लेकर सहमे हुए थे। चार साल पहले पिता की मौत ने बचपन से पिता का साया छीन लिया था। करीब दो महीने पहले मां भी चल बसीं तो 11 साल के कारू, 7 साल के दिलखुश और 5 साल के अंकुश के सामने जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया, अब घर कौन संभालेगा, खाना कौन देगा और पढ़ाई कैसे होगी? बारिश में टपकती छत वाले जर्जर मिट्टी के घर में तीनों भाई बेसहारा जिंदगी काट रहे थे। फिर एक वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचा और उनकी जिंदगी बदलने की शुरुआत हुई। आज उसी जगह करीब 14 लाख रुपए का पक्का मकान खड़ा है, जहां कभी डर और बेबसी थी। यह मदद संत रामपाल महाराज की ओर से अन्नपूर्णा मुहिम के तहत किए जाने की बात कही गई है। संस्था की ओर से बच्चों की भोजन, पढ़ाई और परवरिश में 18 साल की आयु तक सहयोग करने का दावा भी किया गया है। मां की मौत के बाद बच्चों को देखकर ग्रामीण भी रो पड़े समाजसेवी मुकेश यादव बताते हैं कि करीब दो महीने पहले उन्हें बच्चों की मां की मौत की जानकारी मिली। वे गांव से करीब 500 मीटर दूर अपनी मां के घर चाय पीने गए थे। वहां उनकी मां ने बताया कि पड़ोस में एक महिला की मौत हो गई है, इसलिए आज घर में चूल्हा नहीं जलेगा। मुकेश जब मौके पर पहुंचे तो तीनों बच्चों की हालत देखकर रुक गए। मां का शव घर में था और बच्चे रो रहे थे। जर्जर घर की स्थिति ऐसी थी कि बारिश का पानी अंदर तक पहुंच रहा था। मुकेश बताते हैं कि उस समय सबसे बड़ा सवाल अंतिम संस्कार के साथ बच्चों के भविष्य का था। ग्रामीणों ने मिलकर अंतिम संस्कार कराया। इसके बाद उन्होंने बच्चों की मदद के लिए सोशल मीडिया पर वीडियो बनाया और लोगों से सहयोग की अपील की। वह वीडियो आगे कई लोगों तक पहुंचा और आखिरकार संत रामपाल जी महाराज की टीम तक भी पहुंचा। ‘पहले मिट्टी का टूटा घर था, अब हमारा अपना पक्का घर है’ 11 वर्षीय कारू कुमार के लिए मां-पिता के जाने का दर्द शब्दों में बताना मुश्किल है। वह कहता है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। पिता की मौत के बाद मां ही तीनों भाइयों को संभाल रही थीं। मां के जाने के बाद घर में खाने और रहने तक की परेशानी हो गई। कारू के अनुसार, वे जिस घर में रहते थे, वह काफी जर्जर था। बारिश होने पर घर में पानी आ जाता था। कई बार खाने तक की व्यवस्था मुश्किल हो जाती थी। अब घर बदल गया है। बिस्तर है, पंखा है, बिजली है। खाना बनाने के लिए चूल्हा और सिलेंडर है। घर में दाल, चावल, आटा, नमक और तेल समेत राशन की व्यवस्था की गई है। स्कूल जाने के लिए ड्रेस, बैग, जूते-चप्पल, कॉपी और किताबें भी दी गई हैं। कारू की बातों में अब डर की जगह उम्मीद दिखाई देती है। ‘वीडियो संत रामपाल जी महाराज तक पहुंचा, फिर टीम गांव आई’ समाजसेवी चंदन चौधरी के अनुसार, बच्चों की स्थिति की जानकारी मिलने के बाद उनके बारे में बनाया गया वीडियो संत रामपाल जी महाराज की टीम तक पहुंचा। इसके बाद टीम ने गांव आकर बच्चों की स्थिति देखी। उन्होंने बताया कि बच्चों के सामने सिर्फ मकान की समस्या नहीं थी। उन्हें भोजन, शिक्षा, कपड़े और लगातार देखभाल की जरूरत थी। इसके बाद बच्चों के लिए पक्का घर बनवाने और आवश्यक सामान उपलब्ध कराने की पहल की गई। चंदन चौधरी के अनुसार, करीब 14 लाख रुपए की लागत से मकान बनाया गया है। बच्चों के लिए घर के सामान के साथ स्कूल की जरूरत की चीजें भी उपलब्ध कराई गई हैं। उन्होंने यह भी बताया कि बच्चों के 18 वर्ष की आयु तक भोजन और अन्य आवश्यक जरूरतों में सहयोग करने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों की मदद केवल एक व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। समाज के लोगों को भी आगे आकर उनकी शिक्षा और भविष्य की चिंता करनी चाहिए। ‘पिता पहले चले गए, फिर मां भी छोड़ गईं’ तीनों बच्चों की कहानी में सबसे दर्दनाक हिस्सा यह है कि उनके सिर से माता-पिता का साया धीरे-धीरे उठा। ग्रामीणों के अनुसार, बच्चों के पिता फेकू राजवंशी की करीब चार साल पहले ट्रेन से कटकर मौत हो गई थी। इसके बाद मां समाती देवी ही तीनों बच्चों की देखभाल कर रही थीं। आर्थिक परेशानियों के बीच मां ने बच्चों को संभाला, लेकिन करीब दो महीने पहले उनकी भी मौत हो गई। 11 साल के कारू पर अचानक अपने से छोटे दोनों भाइयों की चिंता आ गई। दिलखुश अभी सिर्फ 7 साल का है और अंकुश की उम्र महज 5 साल है। ऐसे में उनके लिए नया घर सिर्फ ईंट और सीमेंट की चारदीवारी नहीं है। यह उस डर से बाहर निकलने की शुरुआत है, जिसमें वे माता-पिता के जाने के बाद जी रहे थे। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने का दावा समाजसेवी मुकेश यादव का कहना है कि बच्चों को अब तक प्रधानमंत्री आवास सहित अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका था। उनका कहना है कि इतने छोटे बच्चों के लिए सरकारी स्तर पर भी नियमित सहायता और शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि गांव के डीलर रामाशीष यादव भी बच्चों तक अनाज पहुंचाने में सहयोग कर रहे हैं। मुकेश का कहना है कि किसी जरूरतमंद बच्चे को मदद के लिए सोशल मीडिया या किसी संस्था तक पहुंचने का इंतजार नहीं करना चाहिए। सरकार की योजनाओं का लाभ समय पर मिले तो ऐसे परिवारों को किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 6 किलोमीटर की शोभायात्रा, तस्वीर को चांदी का मुकुट पहनाया बच्चों के लिए घर और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के बाद ग्रामीणों ने मदद के प्रति आभार जताने के लिए करीब 6 किलोमीटर लंबी शोभायात्रा निकाली। शोभायात्रा में संत रामपाल जी महाराज की तस्वीर शामिल की गई। ग्रामीणों ने तस्वीर को चांदी का मुकुट पहनाकर सम्मान किया। बताया गया कि कार्यक्रम में करीब एक दर्जन लोग बच्चों की मदद और व्यवस्था से जुड़े रहे। संत रामपाल जी महाराज स्वयं कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे। ग्रामीणों ने उनकी तस्वीर के साथ गांव में जुलूस निकालकर मदद के प्रति आभार जताया। मकान पर लगा बैनर, लिखा- ‘हर गरीब को रोटी, कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और मकान’ नए मकान पर एक बड़ा बैनर लगाया गया है, जिसे दूर से भी पढ़ा जा सकता है। बैनर पर लिखा है जगत के गुरु संत रामपाल जी महाराज के द्वारा कलयुग में सतयुग की शुरुआत रोटी, कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और मकान हर गरीब को दे रहे हैं। बताया गया कि यह सहायता अन्नपूर्णा मुहिम के तहत की गई है। हालांकि, इस मकान की दीवारों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह बदलाव है जो तीनों बच्चों की जिंदगी में आया है। कुछ समय पहले तक जहां उनके सामने रहने और खाने का संकट था, वहीं अब उनके पास रहने के लिए पक्का घर, पढ़ाई का सामान और भोजन की व्यवस्था है। ‘अब डर नहीं लगता, हमारे पास घर है’ मां-पिता के बिना बच्चों का जीवन सामान्य नहीं हो सकता। लेकिन सुरक्षित छत और पढ़ाई की व्यवस्था ने कम से कम उनके भविष्य की शुरुआत को एक सहारा दिया है। 11 साल का कारू अब अपने दोनों छोटे भाइयों के साथ इसी नए घर में रहेगा। वह शायद अभी यह नहीं समझता कि 14 लाख रुपए का मकान उसके जीवन में कितना बड़ा बदलाव है। उसके लिए इसका मतलब सिर्फ इतना है कि अब बारिश में घर की छत से पानी नहीं टपकेगा, रात को सोने के लिए सुरक्षित जगह होगी और सुबह स्कूल जाने के लिए किताब-कॉपी और ड्रेस होगी। तीनों भाइयों की जिंदगी में माता-पिता की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। लेकिन गांव के लोगों की पहल और मिली मदद ने उनके सामने एक नई राह जरूर खोल दी है। जिस घर में कुछ महीने पहले मातम और बेबसी थी, आज उसी घर में तीन बच्चों के भविष्य की उम्मीद दिखाई दे रही है।

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