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भारत में जब खान-पान की बात आती है, तो अक्सर एक ही सवाल उठता है, क्या हिंदू धर्म में सिर्फ शाकाहार की ही परंपरा है? हकीकत इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प और विविध है. हमारे देश में धर्म, भूगोल और मौसम के तालमेल ने खान-पान के ऐसे नियम गढ़े हैं, जो हर राज्य और संप्रदाय में पूरी तरह बदल जाते हैं.
शास्त्रों का नजरिया, मन और शरीर तय करता है भोजन
हिंदू दर्शन और आयुर्वेद में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि चेतना को गढ़ने वाला माध्यम माना गया है.
श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने भोजन को तीन श्रेणियों में बांटा है:
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः.
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥ (गीता 17.8)
(अर्थात: आयु, शुद्धि, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त और स्निग्ध भोजन सात्विक प्रवृत्ति के लोगों को प्रिय होते हैं.)
- सात्विक: ताजा, सुपाच्य और बिना प्याज-लहसुन का भोजन, जैसे फल, सब्जियां, दूध, घी और अनाज. यह मन को शांत और एकाग्र रखता है.
- राजसिक: अत्यधिक तीखा, तला-भुना, खट्टा और मसालेदार खाना. यह शरीर में ऊर्जा तो देता है, लेकिन मन में चंचलता और अशांति पैदा करता है.
- तामसिक: बासी, अत्यधिक भारी, नशीले पदार्थ और मांसाहार. शास्त्रों के अनुसार यह शरीर में आलस्य और सुस्ती लाता है.
हर क्षेत्र की अपनी आस्था
हिंदू समाज में भोजन का कोई एक नियम सब पर लागू नहीं होता. यह इस बात पर तय होता है कि आप किस परंपरा और क्षेत्र से जुड़े हैं:
वैष्णव परंपरा: भगवान विष्णु, राम और कृष्ण के उपासक पूरी तरह शाकाहारी होते हैं. गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत के ब्रज क्षेत्र में लहसुन-प्याज तक को छूना वर्जित माना जाता है.
शाक्त परंपरा (देवी उपासना): पूर्वी भारत (बंगाल, असम और ओडिशा) में देवी के उपासक शक्ति पूजा में मछली और बकरे के मांस को ‘भोग’ या ‘प्रसाद’ के रूप में स्वीकार करते हैं. बंगाल में मछली को मांगलिक कार्यों में भी शुभ माना जाता है.
कश्मीरी शैव परंपरा: कश्मीर की ठंडी जलवायु और शैव परंपरा के चलते कश्मीरी पंडितों में महाशिवरात्रि (हेराथ) के पावन पर्व पर विशेष रूप से मटन बनाने और नैवेद्य अर्पित करने की प्राचीन रीत है.
दक्षिण के मंदिर: दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में इमली चावल, नारियल, उड़द दाल और काली मिर्च से बने शुद्ध सात्विक प्रसादम की समृद्ध परंपरा है.
व्रत और उपवास का देसी विज्ञान
नवरात्रि, एकादशी या सावन में अन्न (गेहूं, चावल) छोड़कर ‘फलाहार’ लिया जाता है. कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना और सेंधा नमक का उपयोग धार्मिक दृष्टि से त्याग और संयम का प्रतीक है, तो वैज्ञानिक नजरिए से पाचन तंत्र को समय-समय पर आराम देने का प्राकृतिक तरीका भी है.
कश्मीर की बर्फीली वादियों से लेकर बंगाल की नदियों और गुजरात के तटों तक, आस्था ने प्रकृति और मौसम के अनुरूप थाली सजाई है. हिंदू परंपरा का मूल संदेश भोजन पर पाबंदी लगाना नहीं, बल्कि शरीर, प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता बनाए रखना है.
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