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{ अब देशभर में पहुंच रही है झारखंडी बुनाई व कलाकारी रणदीप दुबे| चरही हजारीबाग के चुरचू प्रखंड के कजरी गांव की महिलाओं ने हुनर को रोजगार में बदलकर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी है। कभी घरेलू कामकाज और सीमित आमदनी तक सिमटी रहने वाली 101 आदिवासी महिलाएं अब करघे पर धागों को आकार देकर परिवार की आर्थिक मजबूती का आधार बन रही हैं। मारसल प्राथमिक बुनकर सहयोग समिति से जुड़ी ये महिलाएं प्राकृतिक रंगों से कपड़े तैयार कर सालाना करीब 1.20 लाख रुपए तक कमा रही हैं। इनके बनाए परिधानों की मांग अब स्थानीय बाजार से निकलकर देश के बड़े शहरों तक पहुंच चुकी है। कजरी के कपड़ों की खासियत केवल हाथ से होने वाली बुनाई नहीं है। इन्हें तैयार करने की पूरी प्रक्रिया भी प्राकृतिक है। कपड़ों को रंग देने के लिए रासायनिक रंगों के बजाय प्रकृति से मिलने वाली चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। नीम और सागवान के पत्ते, हल्दी, प्याज के छिलके, कठ, सिंदूरी के बीज, अनार के बीज जैसी प्राकृतिक सामग्री से अलग-अलग रंग तैयार किए जाते हैं। इससे कपड़ों को आकर्षक रंग मिलता है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी मजबूत होता है। धागों में गांव की मिट्टी, रंगों में जंगल की खुशबू सीखने से कमाने तक का सफर समिति से जुड़ने के बाद महिलाओं को शुरुआत में बुनाई, रंगाई और कपड़ा तैयार करने की तकनीक की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने हाथों के हुनर को कारोबार का रूप देना शुरू किया। धीरे-धीरे तैयार कपड़ों की गुणवत्ता बढ़ी। बाजार में पहचान भी बढ़ी। अब महिलाएं नियमित रूप से करघे पर काम कर अपनी आय बढ़ा रही हैं। कई परिवारों के लिए यह आमदनी घरेलू जरूरतों, बच्चों की पढ़ाई और अन्य खर्चों में सहारा बन रही है।
कजरी के कपड़े की विशेष पहचान, प्राकृतिक रंगों से होती है कलाकारी

