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2027 तक देश को टीबी मुक्त करने का लक्ष्य, पर धनबाद में संसाधन ही नहीं साल 2027 तक देश को टीबी मुक्त बनाना है। इसके लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चल रहा है। धनबाद भी इसका हिस्सा है। स्वास्थ्य विभाग घर-घर जाकर टीबी मरीज खोज रहा है। 500 संदिग्ध चिह्नित किए गए हैं, लेकिन पुष्टि नहीं हो पा रही है। असल में, यहां जांच व्यवस्था खुद बीमार पड़ गई है। जिले के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मॉलिक्यूलर जांच तकनीक (ट्रू-नेट) या पीसीआर की टेस्ट किट खत्म हो गई है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग दशकों पुरानी माइक्रोस्कोपिक स्लाइड जांच के भरोसे रह गया है। लेकिन, इससे सिर्फ गंभीर मरीज ही पहचाने जा रहे हैं और हल्के संक्रमण का पता नहीं चल रहा है। अब सटीक जांच के बिना सरकार का टीबी उन्मूलन लक्ष्य कैसे पूरा होगा, यह एक बड़ा सवाल है। जिले के अधिकतर स्वास्थ्य केंद्रों पर सितंबर से ही स्लाइड वाले टेस्ट किए जा रहे हैं। वहीं, शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज व अस्पताल (एसएनएमएमसीएच) में स्थित केंद्र को सीबी-नेट से जांच के लिए दो दिन पहले 100 टेस्ट किट मुहैया कराई गई हैं, लेकिन ये नाकाफी हैं। दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाएंगी। स्लाइड टेस्ट से चला रहे काम, पर इससे सिर्फ गंभीर मरीजों की पहचान संभव स्क्रीनिंग हो रही है, सटीक डायग्नोसिस नहीं, दोनों पद्धतियों में अंतर पुरानी माइक्रोस्कोप जांच बलगम की स्लाइड बना माइक्रोस्कोप से जांच होती है। यह स्क्रीनिंग है। इसमें मरीज तभी पॉजिटिव आता है, जब बलगम में बैक्टीरिया का लोड बहुत अधिक हो। शुरुआती अवस्था, फेफड़ों के अलावा अन्य अंगों की टीबी और बच्चों की टीबी इसमें अक्सर नहीं पकड़ाती है। इससे एमडीआर टीबी का भी पता नहीं चलता। आधुनिक ट्रू-नेट जांच यह चिप आधारित, बेहद संवेदनशील डीएनए टेस्ट है। बलगम में बैक्टीरिया की बेहद कम मात्रा होने पर भी यह संक्रमण पकड़ लेता है। सबसे अहम बात, महज 1 से 2 घंटे में यह पता चल जाता है कि मरीज पर प्राथमिक दवा असर करेगी या वह दवा प्रतिरोधी यानी मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट (एमडीआर) हो चुका है। पहले से 1900 मरीजों का इलाज चल रहा, नए संदिग्धों की पुष्टि नहीं जिले में 1900 एक्टिव टीबी मरीजों का इलाज चल रहा है। वहीं, अभियान में लगभग 500 संदिग्ध मिले हैं। ट्रू-नेट किट नहीं होने से उनकी अंतिम पुष्टि और ड्रग सेंसिटिविटी जांच अधर में लटक गई है। बिना मॉलिक्यूलर जांच पता लगाना मुश्किल है कि मरीज सामान्य टीबी से पीड़ित है या एमडीआर टीबी से।
मेडिकल कॉलेज अस्पताल की डीएसटी एंड कल्चर लैब भी ठप जिले के सदर अस्पताल, मेडिकल कॉलेज व सभी सीएचसी में ट्रू-नेट जांच की व्यवस्था है। वहां जांच में संक्रमित पाए जाने के बाद मरीज का सैंपल मेडिकल कॉलेज की कल्चर एंड डीएसटी लैब भेजा जाता है। यहां पुष्टि होती है कि मरीज एमडीआर है या नहीं। रीजेंट्स व अन्य संसाधन नहीं होने के कारण यह लैब भी एक माह से अधिक समय से बंद पड़ी है। पुरानी जांच तकनीक में हल्के संक्रमण के छूट जाने का खतरा सीबी-नेट किट की कमी के कारण माइक्रोस्कोपिक टेस्ट में संक्रमण की थोड़ी संभावना वाले मरीजों की ही जांच कराई जा रही है। ट्रू-नेट के अभाव में एक्स-रे और एचआर सीटी स्कैन से संक्रमण का पता लग सकता है। लेकिन, एक्स-रे में सिर्फ गंभीर संक्रमण ही दिखता है। वहीं, सीटी स्कैन का शुल्क मरीजों की जेब पर भारी पड़ता है। संभव है कि पुरानी जांच तकनीक में हल्के संक्रमण वाले मरीज छूट जाएं। इसका सबसे बड़ा जोखिम यह है कि ऐसे मरीज अनजाने में दूसरों को भी संक्रमित करते रहेंगे। – डॉ. विभूतिनाथ, छाती रोग विशेषज्ञ क्वालिटी टेस्ट के लिए गई हैं किट, जल्द मिलेंगी मुख्यालय से सभी जिलों को टेस्ट जांच किट भेजी जाती है। किट की खरीदारी कर ली गई है। उपयोग से पहले उन्हें क्वालिटी टेस्ट के लिए भेजा गया है। उसकी रिपोर्ट आने के बाद जल्द किट मिल जाने की उम्मीद है। तब उसी किट से संदिग्ध मरीजों की जांच कराई जाएगी। – डॉ. रेखा नायक, यक्ष्मा (टीबी) पदाधिकारी, धनबाद
