Friday, October 16, 2026
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SC में डॉक्टर की जमानत कैंसिल करने की याचिका स्वीकार:आरोपी को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी, नवजीवन अस्पताल मामले में कानूनी शिकंजा


बिहारशरीफ के नवजीवन अस्पताल और उसके संचालक डॉक्टर ब्रजेश से जुड़े विवादों में कानूनी शिकंजा एक बार फिर कसता दिख रहा है। अस्पताल के आरोपी चिकित्सक को पूर्व में मिली जमानत को रद्द कराने के लिए पीड़ित पक्ष की ओर से देश की शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जमानत रद्दीकरण (बेल कैंसिलेशन) याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने मामले को विचारार्थ स्वीकार (एडमिट) कर लिया है। आरोपी चिकित्सक को अपना पक्ष रखने के लिए विधिवत नोटिस जारी कर दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रख रहे अधिवक्ता राजीव कुमार सक्सेना ने बताया कि मामले में पर्याप्त और पुख्ता साक्ष्यों को देखने के बाद ही अदालत ने याचिका को स्वीकार किया है। प्रथम दृष्टया साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए दूसरे पक्ष को नोटिस जारी किया है, ताकि दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर जमानत रद्द करने पर अंतिम फैसला लिया जा सके। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और दलीलों का मुख्य आधार अधिवक्ता राजीव कुमार सक्सेना ने बताया कि शीर्ष अदालत में जमानत रद्द कराने के लिए कई ठोस आधार प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख आधार आरोपी पक्ष द्वारा कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने, गवाहों और पीड़ित पक्ष को भयभीत करने और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिशें हैं। अदालत को अवगत कराया गया कि जमानत पर बाहर आने के बाद आरोपी पक्ष ने आपराधिक तत्वों और प्रभाव का इस्तेमाल कर मामले को रफा-दफा करने का लगातार दबाव बनाया। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सामान्य मामलों में यदि प्रारंभिक साक्ष्य कमजोर हों तो अदालतें पहली ही सुनवाई में ऐसी याचिकाओं को खारिज कर देती हैं, लेकिन इस प्रकरण में दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य साक्ष्य इतने मजबूत थे कि अदालत ने मामले को तत्काल एडमिट करते हुए आरोपी पक्ष को तलब करने का आदेश जारी किया। पुलिस जांच और हाईकोर्ट की टिप्पणियों का बना मजबूत आधार इस पूरे मामले में पटना उच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणियां और नालंदा पुलिस की आधिकारिक जांच रिपोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में सबसे बड़ा संबल साबित हुई है। अधिवक्ता ने बताया कि पूर्व में जब गवाहों और पीड़ित पक्ष को धमकाने का मामला सामने आया था, तब उच्च न्यायालय के कड़े रुख के बाद पुलिस को निष्पक्ष जांच कर प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट में रखा था पक्ष नालंदा के पुलिस अधीक्षक ने उच्च न्यायालय के समक्ष स्वयं उपस्थित होकर इस बात की पुष्टि की थी कि विभागीय और मैदानी जांच में यह तथ्य पूरी तरह सही पाया गया है कि पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाया जा रहा था। पैसे के लेन-देन और आपराधिक तत्वों के जरिए समझौते का अनुचित दबाव डाला जा रहा था। जांच में तथ्य सही पाए जाने के बाद ही संबंधित आरोपियों के खिलाफ नई प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इसके अतिरिक्त, मामले में स्थानीय पुलिस स्तर पर भी लापरवाही और मिलीभगत सामने आने पर संबंधित थाना स्तर के अधिकारियों पर गाज गिरी थी और प्रशासनिक कार्रवाई के तहत तबादले किए गए थे। इन्हीं सभी आधिकारिक दस्तावेजों और पुलिस जांच रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जमानत रद्द करने के अचूक आधार के तौर पर पेश किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी निगाहें सर्वोच्च न्यायालय की ओर से नोटिस जारी किए जाने के बाद अब आरोपी चिकित्सक को निर्धारित तिथि पर अदालत के समक्ष उपस्थित होकर अपना जवाब दाखिल करना होगा। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी मामले में उच्च न्यायालय के निर्देश पर दर्ज एफआईआर और जिले के वरीय पुलिस अधीक्षक की स्पष्ट रिपोर्ट संलग्न हो, जिसमें जमानत की शर्तों के उल्लंघन जैसे गवाहों को धमकाना और साक्ष्य प्रभावित करना—का स्पष्ट उल्लेख हो, तो जमानत रद्द होने की संभावना अत्यंत प्रबल हो जाती है। अस्पताल से नवजात के गायब होने का पूरा घटनाक्रम यह पूरा मामला मार्च-अप्रैल 2023 का है। जब पीड़ित अविनाश कुमार के नवजात बच्चे को इलाज के लिए बिहार शरीफ स्थित नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि भर्ती के कुछ ही दिनों बाद अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सक की मिलीभगत से उनके स्वस्थ नवजात शिशु को अचानक गायब कर दिया गया। जब अपने बच्चे की मांग की, तो अस्पताल प्रशासन द्वारा संतोषजनक जवाब देने के बजाय टालमटोल की जाने लगी और बाद में रिकॉर्ड में हेराफेरी कर यह दिखाने का प्रयास किया गया कि उन्हें कोई और बच्चा या बच्ची सौंपी गई थी अथवा बच्चा मृत था। बदहवास पिता जब न्याय की गुहार लगाने स्थानीय बिहार थाना पहुंचे, तो वहां तैनात तत्कालीन पुलिस पदाधिकारियों ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर दी। करीब दो महीने तक थाने के चक्कर काटने के बावजूद जब एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो पीड़ित ने वरिष्ठ अधिकारियों और प्रशासनिक चौखटों पर दस्तक दी। इसके बाद प्रशासनिक जांच की धीमी गति के कारण मामला लगातार खिंचता चला गया। थक-हारकर पीड़ित पिता ने अपने लापता बच्चे की बरामदगी और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक रिट याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई। वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद अब जाकर जब हाईकोर्ट ने सीधी निगरानी शुरू की, तब पुलिस महकमे में हड़कंप मचा है और एक-एक कर मामले की परतें खुलने लगी हैं।

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