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भास्कर न्यूज| सरायकेला राजशाही भले ही इतिहास के पन्नों में सिमट गई हो, लेकिन सरायकेला राजघराने की धार्मिक परंपराएं आज भी उसी श्रद्धा और गरिमा के साथ जीवंत हैं। महासप्तमी के पर शनिवार को राजपरिवार की सदियों पुरानी परंपरा का भव्यता के साथ निर्वहन किया गया। सरायकेला के राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव के नेतृत्व में राजपरिवार के सदस्यों ने विधि-विधान से शस्त्र पूजा की। मां दुर्गा के चरणों में अपने पारंपरिक शस्त्र समर्पित किए। इसके साथ ही विजयादशमी तक शस्त्र धारण नहीं करने का संकल्प लिया गया। महासप्तमी की पूजा पर राजपरिवार की परंपरा के अनुसार शस्त्रागार से पारंपरिक शस्त्र निकाले गए। इसके बाद राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव के नेतृत्व में राजपरिवार के सदस्य शस्त्र लेकर खरकई नदी के तट पहुंचे। वहां विधि-विधान से शस्त्रों का पूजन किया गया। इसके बाद शस्त्रों को एक निर्धारित स्थान पर रखकर पुजारी के माध्यम से मां दुर्गा का आह्वान कर पूजा-अर्चना की गई। इसके उपरांत राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक गाजे-बाजे के साथ पैदल राजमहल पहुंचे। वहां मां दुर्गा के चरणों में शस्त्र समर्पित किए गए। इस दौरान राजपरिवार के सदस्यों ने परंपरा के अनुरूप विजयादशमी तक शस्त्र धारण नहीं करने का संकल्प दोहराया। राजपरिवार की यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है। यह सरायकेला की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। बदलते समय के बीच इस परंपरा का निरंतर निर्वहन क्षेत्र की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव को दर्शाता है। सरायकेला की दुर्गा पूजा में राजपरिवार की शस्त्र पूजा सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। मां दुर्गा को शक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। इसी आस्था के साथ राजपरिवार में शस्त्रों की पूजा करने की परंपरा चली आ रही है। उन्हें मां के चरणों में समर्पित किया जाता है। महासप्तमी के दिन शस्त्रागार से पारंपरिक शस्त्र निकालने से लेकर खरकई नदी के घाट पर पूजा तक प्रत्येक अनुष्ठान का अपना विशेष महत्व है। फिर राजमहल लौटकर मां दुर्गा के चरणों में शस्त्र समर्पित किए जाते हैं। विजयादशमी तक शस्त्र धारण नहीं करने का संकल्प भी इसी परंपरा का हिस्सा है। राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव के नेतृत्व में इस वर्ष भी राजपरिवार ने पूरी श्रद्धा के साथ इस परंपरा का निर्वहन किया। यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता है। सरायकेला की ऐतिहासिक पहचान को भी जीवंत बनाए रखता है।
राजघराने की रस्म का निर्वहन, मां के चरणों में शस्त्र समर्पित
