गया में महिला एवं बाल विकास निगम के देखरेख में आज को “प्रज्ञा शक्ति” कार्यक्रम के तहत एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिलाधिकारी शशांक शुभंकर की अध्यक्षता में एक निजी होटल में हुई इस कार्यशाला का उद्देश्य विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के व्यवहार,
.
कार्यशाला का शुभारंभ जिलाधिकारी, सहायक समाहर्ता, सिविल सर्जन और डीपीओ आईसीडीएस सहित अन्य पदाधिकारियों ने दीप प्रज्वलित कर किया। यह कार्यक्रम गया जिले में एक मॉडल पहल के रूप में शुरू किया गया है।
अतिरिक्त मदद से भविष्य बनाने वाले बच्चों को चिन्हित करने की कही बात
जिलाधिकारी ने बताया कि बाल विकास परियोजना पदाधिकारी, विद्यालयों के शिक्षक, श्रम विभाग के अधिकारी और चाइल्ड प्रोटेक्शन से जुड़े पदाधिकारी प्रतिदिन बच्चों के संपर्क में रहते हैं। उन्होंने जोर दिया कि सभी बच्चों का व्यवहार और विकास स्तर अलग-अलग होता है, इसलिए ऐसे बच्चों को चिन्हित करना आवश्यक है जिन्हें थोड़ी अतिरिक्त सहायता से बेहतर भविष्य दिया जा सके।
उन्होंने बाल विकास परियोजना पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि आंगनबाड़ी केंद्रों में आने वाले छोटे बच्चों पर विशेष ध्यान दें। जिलाधिकारी ने कहा कि प्रारंभिक अवस्था में अतिरिक्त देखभाल और मार्गदर्शन मिलने से बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में काफी सुधार संभव है। उन्होंने आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के समग्र विकास के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पर बल दिया।
एक समान रूप से विषयों को नहीं समझ पाते
विद्यालय स्तर के बच्चों के संबंध में, जिलाधिकारी ने कहा कि माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में सभी बच्चे एक समान रूप से विषयों को नहीं समझ पाते हैं। कई बच्चे पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं और आत्मविश्वास खो देते हैं। ऐसे बच्चों को चिन्हित कर उन्हें विशेष शैक्षणिक सहयोग और परामर्श दिया जाना चाहिए, ताकि वे भी शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़कर आगे बढ़ सकें।
इसके अलावा, जिलाधिकारी ने श्रम विभाग के पदाधिकारियों को ईंट-भट्ठों और फैक्ट्रियों में कार्यरत बच्चों की पहचान करने का भी निर्देश दिया।

उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चे अक्सर शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और उनके विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इन बच्चों को भी मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए. कार्यशाला के दौरान बाल विकास परियोजना पदाधिकारी और विभिन्न विद्यालयों के शिक्षक, जिन्हें मास्टर ट्रेनर के रूप में नामित किया गया है, को विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
प्रशिक्षण सत्र में आदित्य बिरला फाउंडेशन के रिसोर्स पर्सन मध्य प्रदेश से आए निखिल मिश्रा और मुंबई से आई मीका चौहान सहित अन्य विशेषज्ञों ने बच्चों के मानसिक विकास, व्यवहारिक समस्याओं और उनके समाधान के तरीकों पर विस्तार से जानकारी दी। अपने संबोधन में जिलाधिकारी ने बताया कि इससे पहले दो बार ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

4000 से अधिक बच्चों की हुई पहचान
जिले में अब तक 4000 से अधिक ऐसे बच्चों की पहचान की जा चुकी है जिन्हें विशेष सहायता और हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पहले कई संस्थान अपने-अपने स्तर पर छोटे-छोटे प्रयास कर रहे थे, लेकिन अब इन प्रयासों को एकीकृत कर पूरे जिले में एक समेकित अभियान के रूप में चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि चिन्हित बच्चों में कुछ में चिड़चिड़ापन, सामाजिक समायोजन में कठिनाई और व्यवहार संबंधी अन्य समस्या देखी गई हैं। ऐसे बच्चों को जिला स्तर पर चिन्हित संस्थानों में बुलाकर आवश्यक परामर्श और सहयोग प्रदान किया जाएगा, ताकि उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।
जिलाधिकारी ने कहा कि इस प्रकार का समेकित प्रयास भारत में पहली बार जिले स्तर पर किया जा रहा है। उन्होंने विभिन्न राज्यों से आए सभी रिसोर्स पर्सन्स का धन्यवाद करते हुए कहा कि प्रशिक्षण के माध्यम से सभी संबंधित पदाधिकारी बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कार्यशाला में सहायक समाहर्ता, सिविल सर्जन, डीपीओ आईसीडीएस, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी, यूनिसेफ की वरीय पदाधिकारी श्रीमती गार्गी, डीपीएम स्वास्थ्य, डीपीएम महिला एवं बाल विकास निगम, सहायक निदेशक बाल संरक्षण, सभी बाल विकास परियोजना पदाधिकारी, सुशांत आनंद (डीएमसी), डीएचईडब्ल्यू, जेंडर स्पेशलिस्ट विशाल कुमार, कवच परियोजना सेंटर डायरेक्टर दिनेश कुमार और विभिन्न विद्यालयों के शिक्षकगण उपस्थित थे।




