झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को हिरासत में हुई मौतों से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने राज्य में हिरासत में हुई मौतों के मामलों में कानून का पालन नहीं होने पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने राज्य सरकार, गृह विभाग और सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि हिरासत में हुई मौत के जिन 262 मामलों में न्यायिक जांच नहीं हुई, उनमें दोबारा न्यायिक जांच कराई जाए। अदालत ने कहा कि वर्ष 2018 से अब तक राज्य में 427 कस्टोडियल डेथ हुई हैं, जिनमें से 262 मामलों में न्यायिक दंडाधिकारी से जांच कराने के बजाय कार्यपालक दंडाधिकारी से जांच कराई गई। यह कानून और संविधान दोनों का उल्लंघन है। अदालत ने इसे ‘व्यवस्थित विफलता’ बताते हुए बीएनएसएस की धारा 196 (2) का हवाला देते हुए कहा कि हिरासत में मौत, गायब होने या हिरासत में दुष्कर्म जैसे मामलों की जांच केवल न्यायिक दंडाधिकारी ही कर सकते हैं। 6 माह के अंदर पूरी हो जांच अदालत ने कहा कि संबंधित प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश 15 दिनों के अंदर न्यायिक दंडाधिकारी नामित करेंगे और छह महीने के भीतर जांच पूरी कराई जाएगी। इसके अलावा अदालत ने मुख्य सचिव और गृह विभाग को 30 दिनों के अंदर सभी जिलों को पत्र जारी करने का निर्देश दिया है कि भविष्य में कस्टोडियल डेथ, गायब होने या हिरासत में दुष्कर्म के हर मामले में केवल न्यायिक दंडाधिकारी ही जांच करेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच में हिरासत में हिंसा या लापरवाही सामने आती है तो पीड़ित परिवार को मुआवजा देने की प्रक्रिया भी शुरू की जाए। मालूम हो कि धनबाद निवासी मुमताज अंसारी ने जनहित याचिका दाखिल करके मांग की थी कि पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत, गायब होने या महिला के साथ दुष्कर्म के मामलों में अनिवार्य रूप से न्यायिक जांच कराई जाए। याचिकाकर्ता की ओर से मो. शादाब अंसारी ने पक्ष रखा था जबकि, राज्य सरकार की ओर से गौरव राज ने दलील पेश की। पुलिस-प्रशासनिक तंत्र के भाईचारे से निष्पक्ष जांच में बाधा अदालत ने कार्यपालक दंडाधिकारी द्वारा जांच कराने के मामले पर कहा कि वर्ष 2006 में कानून में संशोधन कर स्पष्ट कर दिया गया था कि हिरासत में मौत या गायब होने के मामलों में जांच केवल न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा ही की जाएगी। इसके बावजूद राज्य सरकार वर्षों तक इस कानूनी व्यवस्था की अनदेखी करती रही। अदालत ने कहा कि हिरासत में रहने वाला व्यक्ति भी जीवन और गरिमा के अधिकार से वंचित नहीं होता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कस्टोडियल डेथ सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से एक है और कानून से ऊपर कोई नहीं है।
262 मामलों की जांच अब न्यायिक दंडाधिकारी करेंगे
झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को हिरासत में हुई मौतों से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने राज्य में हिरासत में हुई मौतों के मामलों में कानून का पालन नहीं होने पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने राज्य सरकार, गृह विभाग और सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि हिरासत में हुई मौत के जिन 262 मामलों में न्यायिक जांच नहीं हुई, उनमें दोबारा न्यायिक जांच कराई जाए। अदालत ने कहा कि वर्ष 2018 से अब तक राज्य में 427 कस्टोडियल डेथ हुई हैं, जिनमें से 262 मामलों में न्यायिक दंडाधिकारी से जांच कराने के बजाय कार्यपालक दंडाधिकारी से जांच कराई गई। यह कानून और संविधान दोनों का उल्लंघन है। अदालत ने इसे ‘व्यवस्थित विफलता’ बताते हुए बीएनएसएस की धारा 196 (2) का हवाला देते हुए कहा कि हिरासत में मौत, गायब होने या हिरासत में दुष्कर्म जैसे मामलों की जांच केवल न्यायिक दंडाधिकारी ही कर सकते हैं। 6 माह के अंदर पूरी हो जांच अदालत ने कहा कि संबंधित प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश 15 दिनों के अंदर न्यायिक दंडाधिकारी नामित करेंगे और छह महीने के भीतर जांच पूरी कराई जाएगी। इसके अलावा अदालत ने मुख्य सचिव और गृह विभाग को 30 दिनों के अंदर सभी जिलों को पत्र जारी करने का निर्देश दिया है कि भविष्य में कस्टोडियल डेथ, गायब होने या हिरासत में दुष्कर्म के हर मामले में केवल न्यायिक दंडाधिकारी ही जांच करेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच में हिरासत में हिंसा या लापरवाही सामने आती है तो पीड़ित परिवार को मुआवजा देने की प्रक्रिया भी शुरू की जाए। मालूम हो कि धनबाद निवासी मुमताज अंसारी ने जनहित याचिका दाखिल करके मांग की थी कि पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत, गायब होने या महिला के साथ दुष्कर्म के मामलों में अनिवार्य रूप से न्यायिक जांच कराई जाए। याचिकाकर्ता की ओर से मो. शादाब अंसारी ने पक्ष रखा था जबकि, राज्य सरकार की ओर से गौरव राज ने दलील पेश की। पुलिस-प्रशासनिक तंत्र के भाईचारे से निष्पक्ष जांच में बाधा अदालत ने कार्यपालक दंडाधिकारी द्वारा जांच कराने के मामले पर कहा कि वर्ष 2006 में कानून में संशोधन कर स्पष्ट कर दिया गया था कि हिरासत में मौत या गायब होने के मामलों में जांच केवल न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा ही की जाएगी। इसके बावजूद राज्य सरकार वर्षों तक इस कानूनी व्यवस्था की अनदेखी करती रही। अदालत ने कहा कि हिरासत में रहने वाला व्यक्ति भी जीवन और गरिमा के अधिकार से वंचित नहीं होता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कस्टोडियल डेथ सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से एक है और कानून से ऊपर कोई नहीं है।

