पूर्णिया के जियनगंज गांव से प्रभात खबर के वरीय पत्रकार अरुण कुमार व अखिलेश चंद्रा और साथ में अक्षय कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट:
Andhra Pradesh Factory: पूर्णिया के इस गांव में मौत हर घर में चुपके से दस्तक दे रही है. हर कोई इस बात को लेकर सशंकित है कि अगला चिराग किस घर का बुझेगा? पूरे गांव में खामोशी है. कसबा प्रखंड के जियनगंज गांव और आसपास के इलाकों से दो दर्जन से अधिक मजदूर रोजगार की तलाश में आंध्र प्रदेश गये थे. उन्हें उम्मीद थी कि मेहनत करेंगे, तो परिवार की गरीबी दूर होगी. पर, उन्हें क्या पता था कि जिस फैक्ट्री में वे काम करने जा रहे हैं, वही उनकी जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी. आज उन्हीं युवाओं में से कई इस दुनिया में नहीं हैं और कई जिंदगी व मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं.
परदेस की उस काल कोठरी नुमा फैक्ट्री की जहरीली गर्द ने जिन चार चिरागों को हमेशा के लिए बुझा दिया, उनके नाम:
मो मशद ( 22 वर्ष)
कुंदन ऋषि ( 20 वर्ष)
अरविंद कुमार ऋषि ( 18 वर्ष)
मो मुस्तफा ( 55 वर्ष)

चार दिन के भीतर दो मौतों से कांपा गांव:
मंगलवार को इस गांव के 22 वर्षीय मो मशद की मौत ने सभी को झकझोर दिया है. वह तीन माह से बेड पर पड़ा था. बुजुर्ग पिता उसके इलाज के लिए दर-दर भटकते रहे, लेकिन उसे बचा नहीं पाये. मशद इकलौता नहीं है. उसकी मौत से चार दिन पूर्व इसी गांव के मो मुस्तफा (55 वर्ष) की मौत हो चुकी है. गांव वाले बताते हैं कि इन्हीं मजदूरों के साथ आंध्र प्रदेश से लौटे सर्रा बथना निवासी 18 वर्षीय बीमार मजदूर अरविंद कुमार ऋषि, नगर परिषद कसबा के वार्ड संख्या 12 तारानगर मुहल्ला निवासी कुंदन कुमार की भी मौत बीमारी की वजह से हो चुकी है. अन्य एक युवक का नाम पता नहीं चल पा रहा है. अन्य जो जिंदा हैं, वह आज भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं. मो मसद की मां का रो-रोकर बुरा हाल है. वृद्ध पिता मुश्ताक आलम बार-बार एक ही सवाल पूछ रहे हैं- ‘मेरा बेटा कमाने गया था, उसकी मौत का जिम्मेदार कौन है?’
हर साल हजारों युवा पलायन को हैं मजबूर :
दरअसल, सीमांचल के गांवों से हर साल हजारों युवा रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर निकल पड़ते हैं. इस उम्मीद में कि उनकी कमाई से घर की टूटी दीवारें पक्की हो जाएंगी. पर, पूर्णिया के कसबा इलाके के कई परिवारों के लिए यह पलायन अब एक ऐसी त्रासदी बन गयी है, जिसे वे शायद कभी भूल नहीं पाएंगे.

परदेस से मजदूरी की कमाई नहीं, मौत और बीमारी लौटी है:
इसी गांव के पेशे से शिक्षक सरवर आलम कहते हैं कि इस घटना को सिर्फ एक या दो मजदूरों की मौत से जोड़कर न देखें, बल्कि इस पलायन के पीछे सैकड़ों गरीब परिवारों की मजबूरी और बेबसी छिपी हुई है. पलायन की कहानियां पहले भी सुनी थीं, लेकिन इस बार परदेस से मजदूरी की कमाई नहीं, मौत और बीमारी लौटी है.

जमीन और मवेशी बेचकर किसी तरह बच्चों का उपचार कराया जा रहा है:
मजदूरों के परिजनों का आरोप है कि आंध्र प्रदेश की फैक्ट्री में युवाओं से लंबे समय तक धूल भरे वातावरण में काम कराया गया. धीरे-धीरे उनकी तबीयत बिगड़ती गयी. जब वे घर लौटे तो कई इतने बीमार थे कि अपने पैरों पर खड़े तक नहीं हो पा रहे थे. अब हालत यह है कि जिस किसी ने वहां से भागकर अपनी जान बचायी है, वह गंभीर बीमारी का शिकार हो चुका है. परिजनों का कहना है कि इलाज में सारी जमा-पूंजी खत्म हो गयी. अब जमीन और मवेशी बेचकर किसी तरह बच्चों का उपचार कराया जा रहा है.
छह महीने गांव में किसानी, छह महीने परदेस में जवानी खपाने को मजबूर:
जियनगंज गांव की आबादी दो हजार के करीब है. अधिकांश मजदूरी कर अपना गुजारा करते हैं. साल के छह माह यहां रहते हैं, तो छह माह परदेस कमाने चले जाते हैं. यहां के बुजुर्ग मो शमशाद बताते हैं कि खेती के बाद यहां कोई काम नहीं रहता. मजबूरी में बाहर कमाने जाना पड़ता है. यहां हर घर से एक सदस्य जरूर कमाने जाता है.
क्या कहते हैं चिकित्सक:
पत्थर के पाउडर और धूल के लगातार संपर्क में रहने तथा सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करने से फेफड़ों पर गंभीर असर पड़ सकता है. धूल के कण फेफड़ों में जमा होकर संक्रमण फैलाते हैं, जिससे समय के साथ फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाता. प्रभावित गांव में मेडिकल टीम भेजकर लोगों के स्वास्थ्य की जांच करायी जा रही है.
डॉ प्रमोद कुमार कनोजिया, सिविल सर्जन, पूर्णिया
मृतक की बीमारी का संबंध उसके कार्यस्थल से हो सकता है. प्रारंभिक जांच में सांस संबंधी समस्या और फेफड़ों के प्रभावित होने की आशंका है. नमूने सुरक्षित रखे गये हैं, जिनकी जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होगी.
डॉ पंकज कुमार, फोरेंसिक विभाग, जीएमसीएच.
The post फेफड़ों में भर गयी मौत की धूल, रोते-बिलखते परिजनों ने कहा- हुजूर, पत्थर तोड़नेवाली फैक्ट्री में काम करते-करते पत्थर हो गया बेटा का फेफड़ा! appeared first on Prabhat Khabar.

