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गोपालगंज के बरौली निवासी डॉ. अभिषेक रंजन ने एम्स की नौकरी छोड़कर अपने गृह जिले लौटने का फैसला किया। वे अब तक 50 हजार से ज्यादा लोगों को सीपीआर (CPR) की ट्रेनिंग दे चुके हैं। उनका मकसद बिहार के लोगों को आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार करना है। डॉ. अभिषेक बरौली प्रखंड के कोईनि गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने कटक मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस, पीजी और एमडी की पढ़ाई की। एम्स के श्वास रोग विभाग में तीन साल सेवा देने के बाद वे 2018 में गोपालगंज लौट आए। डॉ. अभिषेक ने बताया कि एम्स में नौकरी के दौरान उन्होंने देखा कि बिहार के कई लोग इलाज के लिए वहां आ रहे थे। तभी उन्होंने अपने गृह जिले में रहकर लोगों की सेवा करने का फैसला किया। अब वे शहर में निजी क्लिनिक चलाने के साथ ग्रामीण इलाकों में सीपीआर की ट्रेनिंग देते हैं। उनकी पहल से स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ रही है और असमय होने वाली मौतों का जोखिम भी कम हो रहा है। बिहार के लोगों को सेवाएं देने के लिए छोड़ी नौकरी डॉ. अभिषेक मानते हैं कि उनके गृह जिले और बिहार के लोगों को भी उसी स्तर की बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी चाहिए, जो देश के बड़े शहरों में उपलब्ध हैं। शहर के कॉलेज रोड स्थित अपने निजी क्लिनिक में मरीजों का सफल इलाज करने के साथ-साथ उन्होंने अपनी स्वास्थ्य सेवा को अस्पताल की चार दीवारों से बाहर निकाला है। उनका मानना है कि आपात स्थिति में समय ही सबसे बड़ा जीवनरक्षक होता है। अक्सर दिल का दौरा पड़ने या सांस रुक जाने जैसी आपात स्थितियों में डॉक्टर या एंबुलेंस के आने तक काफी समय निकल जाता है, जो कई बार मरीज के लिए जानलेवा साबित होता है। सीपीआर की देते है मुफ्त ट्रेनिंग इसी सोच के तहत उन्होंने ग्रामीण इलाकों में जाकर आम लोगों को सीपीआर कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशनकी मुफ्त ट्रेनिंग देना शुरू किया है। उनका मुख्य उद्देश्य गाँव के आम नागरिकों, युवाओं और परिवारों को इस काबिल बनाना है कि वे ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय सही समय पर शुरुआती प्राथमिक चिकित्सा दे सकें। दैनिक भास्कर से खाश बातचीत में उन्होंने इस मुहिम की शुरुआत आगे की योजना समेत कई अहम बाते कही। उन्होंने खाश बातचीत में कहा कि इसकी शुरुआत उन्होंने मोतिहारी पुलिस केंद्र से की थी। अब तक वे बिहार के लगभग 18 जिलों में 50,000 से अधिक लोगों को सीपीआर की ट्रेनिंग दे चुके हैं। साल के अंत तक शेष 22 जिलों को भी कवर करने का लक्ष्य है। वे पुलिसकर्मियों को मास्टर ट्रेनर बना रहे हैं क्योंकि सार्वजनिक स्थानों और बाजारों में सबसे पहले पुलिसकर्मी तैनात मिलते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों और घरों तक इस मुहिम को पहुंचाने के लिए वे आशा दीदी, जीविका दीदी, और आंगनवाड़ी सेविका/सहायिकाओं को भी प्रशिक्षित कर रहे हैं ताकि वे ‘ह्यूमन हेल्थ लीडर’ बन सकें। कैसे आया सीपीआर की ट्रेनिंग का ख्याल उन्होंने बताया कि कोरोना काल के दौरान युवाओं और आम लोगों में बढ़ते हार्ट अटैक के मामलों को देखकर सीपीआर की ट्रेनिंग देने का ख्याल आया। भारत में केवल 1.8%आबादी को ही सीपीआर की जानकारी है, जबकि विदेशों में यह आंकड़ा 20%से अधिक है। हार्ट अटैक के बाद शुरुआती 4 मिनट में सीपीआर देने से मरीज के बचने की संभावना 3 गुना बढ़ जाती है, जबकि 12 मिनट के बाद यह संभावना बेहद कम हो जाती है। अस्पताल पहुंचने या एंबुलेंस आने में अक्सर 20 मिनट से ज्यादा का समय लग जाता है, जिससे मरीज की रास्ते में ही मौत हो जाती है। सरकार से नहीं लेते कोई अनुदान डॉ. अभिषेक इस मुहिम के लिए सरकार से कोई अनुदान या आर्थिक मदद नहीं लेते। दूर-दराज के जिलों में जाने, गाड़ी, टीम के ठहरने और खाने-पीने का पूरा खर्च (प्रति दो जिला लगभग 20,000) वे अपनी निजी बचत (ओपीडी की कमाई) से वहन करते हैं। शुरुआत में दूर-दराज के इलाकों में जाना, समय निकालना और पुलिसकर्मियों को इकट्ठा करना एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन राज्य के डीजीपी और शासन-प्रशासन से उन्हें पूरा सहयोग मिला। प्रभारी मंत्री ने किया सम्मानित हाल ही में उनके इस सराहनीय प्रयास के लिए जिले के प्रभारी मंत्री द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया है। उनका उद्देश्य इस अभियान को एक राष्ट्रीय मुहिम बनाना है ताकि इसे ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा सके। पटना में पढ़ाई के दौरान एक डॉक्टर मकान मालिक के मान-सम्मान को देखकर उन्हें चिकित्सक बनने की प्रेरणा मिली। 12वीं के दौरान महज 0.05 अंक से कट-ऑफ से चूक जाने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और संघर्ष करके इस मुकाम तक पहुंचे। बहरहाल एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में चिकित्सक की नौकरी छोड़ गृह जिले के लोगों की सेवा को प्राथमिकता देना अपने आप में मिसाल है।
AIIMS की नौकरी छोड़ डॉ. अभिषेक लौटे गोपालगंज:बिहार के 18 जिलों में दी 50 हजार लोगों को मुफ्त CPR ट्रेनिंग, कोरोना काल में आया था ख्याल
