‘मैं बेगूसराय की कावर झील हूं। मेरी पहचान मीठे पानी के झील के रूप में रही है। मैं मैं एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की गोखुर झील (Oxbow Lake) हूं। मेरा निर्माण गंगा की सहायक बूढ़ी गंडक नदी के घुमाव से कटकर हुआ है। मेरा क्षेत्र तो करीब 67.86 वर्ग किलोम
.
सिकुड़ते जलस्तर और अतिक्रमण के कारण मेरा मुख्य जल क्षेत्र लगभग 26.20 वर्ग किलोमीटर (2,620 हेक्टेयर) ही बचा है। गर्मियों में तो मैं और भी ज्यादा सिकुड़ कर मात्र 10-15 वर्ग किलोमीटर रह जाती हूं। इसके पीछे प्रशासनिक उपेक्षा, लगातार अतिक्रमण और झील का कुप्रबंधन वजह है। मैं अब छोटे-छोटे दलदली टुकड़ों में सिमट चुकी हूं।’
कावर झील की कहानी क्या है? कावर झील क्यों प्रसिद्ध है? कावर झील क्यों लगातार सिकुड़ रही है? पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट।
कावर झील की 3 तस्वीरें देखिए

कावर झील में गर्मियों और सर्दियों के मौसम में सैलानियों की भीड़ उमड़ती है।

कावर झील का अधिकतर हिस्सा सूखता जा रहा है।

कावर झील में मायूस बैठा एक नाविक और गाइड।
सबसे पहले कहानी बिहार के पहले रामसर साइट की
कावर झील को साल 2020 में बिहार के पहले रामसर साइट का दर्जा मिला है। ऐसा इसलिए क्योंकि कावर झील का ग्लोबल इकोलॉजिकल इम्पोर्टेंस है। कावर झील को प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग भी माना जाता है। सर्दियों के मौसम में सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (रूस, साइबेरिया और मध्य एशिया) से होकर 220 से अधिक प्रजातियों के प्रवासी पक्षी यहां आते हैं। हालांकि, रामसर का अंतरराष्ट्रीय तमगा मिलने के बावजूद धरातल पर संरक्षण के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी गई।
कावर झील में मछलियों की 50 से अधिक प्रजातियां और कई दुर्लभ जलीय वनस्पतियां पाई जाती हैं। बायोडावयर्सिटी के अलावा कावर झील का धार्मिक महत्व भी है। झील के बीचों-बीच एक टीले पर प्राचीन जयमंगला गढ़ मंदिर स्थित है, जिसे 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है।

कावर झील के आसपास के 16 गांवों की आबादी करीब 5 लाख है। इनमें 7 हजार किसान परिवारों की जमीन झील और पक्षी विहार में गई है।
एनजीटी और झील के विवाद के बारे में जानिए
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT में कावर झील का मामला इसके पारिस्थितिक पतन (ecological decline) और अतिक्रमण से जुड़ा है। इसके सूखने के कारण स्थानीय मछुआरों और किसानों के बीच टकराव पैदा हो गया है।
किसानों की मांग है कि चूंकि झील का बड़ा हिस्सा अब सूख चुका है, इसलिए सूखी हुई जमीन को पक्षी अभयारण्य की अधिसूचना से बाहर किया जाए ताकि वे यहां कानूनी रूप से खेती कर सकें।
वहीं, मछुआरों की मांग है कि इस झील पर करीब 20 हजार से ज्यादा मछुआरे अपनी जीविका के लिए आश्रित हैं, वे चाहते हैं कि झील में जलस्तर बरकरार रखा जाए और इसका दायरा बढ़ाया जाए, क्योंकि पानी कम होने से मछलियों की संख्या में भारी गिरावट आई है और उनके सामने भुखमरी की नौबत है।
NGT और जल संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि झील को बचाने के लिए इसके प्राकृतिक जल स्रोतों और नहरों को अतिक्रमण मुक्त करना बहुत जरूरी है।

झील के अलावा इलाके की जमीन में किसान खेती कर अपना गुजारा करते हैं। 5 जनवरी 2013 को तत्कालीन डीएम ने जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी थी।
31 अगस्त से पहले केंद्र, बिहार सरकार समेत प्रमुख पर्यावरण नियामकों को देना होगा जवाब
कावर झील के लगातार गिरते पारिस्थितिक तंत्र और सिकुड़ते जल क्षेत्र पर NGT ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान लिया। एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने केंद्र सरकार, बिहार सरकार और प्रमुख पर्यावरण नियामकों से जवाब तलब किया है।
पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी प्रतिवादी अपना जवाब हलफनामे के रूप में कोलकाता स्थित पूर्वी क्षेत्रीय पीठ के समक्ष 31 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले अनिवार्य रूप से दाखिल करें।
मामले में केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, बिहार सरकार के मुख्य सचिव, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण एवं बिहार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को नोटिस भेजा गया है।

काबर झील में पर्यटक सूर्योदय के साथ झील में खिले कमल, मछलियों को देख सकते हैं। इसके अलावा, देसी-विदेशी पक्षियों के झुंड का भी आनंद ले सकते हैं।
अब जानिए कावर झील के बीचोंबीच बसे जयमंगला गढ़ मंदिर का विवाद क्या है?
कावर झील के बीच स्थित जयमंगला गढ़ मंदिर को लेकर हाल ही में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। दरअसल, पिछले साल एक पेड़ गिरने से मंदिर का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था। जब स्थानीय लोगों और पुजारियों ने चंदा इकट्ठा करके मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू किया, तो वन विभाग ने इसे संरक्षित वन क्षेत्र का उल्लंघन मानते हुए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।
वन विभाग ने निर्माण में लगे लोगों और पुजारियों पर 18 फरवरी 2025 को FIR भी दर्ज करा दी। इसके विरोध में स्थानीय लोगों ने ‘जयमंगला गढ़ मंदिर निर्माण संघर्ष समिति’ बना ली और प्रशासन के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन किया। हालांकि, क्षतिग्रस्त मंदिर को कुछ दिन बाद ही निजी सहयोग से ठीक करा लिया गया था।
इसी मंदिर के पास रहने वाले लगभग 1300 मुसहर समुदाय के लोगों को प्रशासन की ओर से अतिक्रमणकारी बताकर बस्ती खाली करने का नोटिस दिया गया था, जिस पर बाद में पटना हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी।

झील का जलस्तर घटने से मछुआरे पंजाब, दिल्ली, गुजरात में मजदूरी के लिए मजबूर
झील में पानी नहीं रुकने और मछलियों की नस्लें खत्म होने के कारण हजारों मछुआरे अपना पैतृक पेशा छोड़कर पंजाब, दिल्ली और गुजरात जैसे राज्यों में मजदूरी करने चले गए हैं। किसानों पर भी दोहरी मार पर रही है, न फसल उगा पा रहे, न जमीन बेच पा रहे हैं। पानी के असंतुलन के कारण पहले यहां व्यापक पैमाने पर धान की खेती होती थी, जो अब पूरी तरह बंद हो चुकी है। अब किसान केवल मक्का, गन्ना, गेहूं और ढैंचा उगाने पर मजबूर हैं।
1989 की अधिसूचना और 2013 से रजिस्ट्री बैन
बिहार सरकार ने 1989 में कांवर झील को बर्ड सेंचुरी घोषित करने के लिए गजट जारी किया और करीब 6000 हेक्टेयर निजी एवं टाल भूमि के अधिग्रहण की बात कही। लेकिन आज तक न सरकार ने किसानों को जमीन का एक रुपया मुआवजा दिया और न ही जमीन का अधिग्रहण किया।
2013 में सरकार ने इस क्षेत्र की जमीनों की खरीद-बिक्री (रजिस्ट्री) पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसके कारण करीब दो लाख की आबादी प्रशासनिक चक्रव्यूह में फंस गई है। किसान अपनी ही जमीन के दस्तावेज हाथ में रखकर लाचार हैं, वे न तो अपनी बेटियों की शादी के लिए जमीन बेच सकते हैं, न बच्चों की पढ़ाई के लिए और न ही रोजगार के लिए।

बिंदेश्वरी दुबे, लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक ने घोषणाएं की पर काम नहीं हुआ
कावर नेचर क्लब के संयोजक और ‘कावर टाल: एक रामसर साइट’ के लेखक महेश भारती कहते हैं कि कावर असल में एक टाल है जो बूढ़ी गंडक और बागमती के रास्ता बदलने से बनी छाड़न झील है। बरसात में यह 6000 हेक्टेयर से अधिक फैलती है और गर्मी में 1000 से 2000 हेक्टेयर तक सिमट जाती है। पहले यहां 27-28 प्रकार की मछलियां थरोहू, कतला, बुआरी, सिंघी, गढ़ई, पोठिया, चेंगरा, फोकवा, इचना। अब केवल 5-6 प्रजातियां बची है।
सर्दियों में रूस, साइबेरिया, मंगोलिया और हिमालय से कॉमन टील, शॉवलर, लालसर एवं अधंगी सहित 150 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी यहां आते थे। लेकिन अवैध शिकारमाही और धान की खेती बंद होने से उनका आना कम हो गया है। 1000 मछुआरा परिवार, 20000 किसान परिवार और 1 लाख मजदूर परिवार इस पर आश्रित हैं।

1989 में सरकार ने इसे अभयारण्य के लिए चिन्हित किया, लेकिन मुआवजा नहीं दिया और 2013 में रजिस्ट्री बंद कर दी। सरकार और समाज का ध्यान इस तरफ नहीं है। पिछले 20 सालों में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। उन्होंने कहा कि अपने मुख्यमंत्री काल में बिंदेश्वरी दुबे, लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक सबने घोषणाएं की पर काम शून्य हुआ।
NGT कह रही है, लेकिन दिल्ली-कोलकाता में बैठकर हवा-हवाई कागजी अर्जियों से समाधान नहीं होगा। एनजीटी को धरातल के भूगोल, ऐतिहासिक संदर्भ और किसानों-मछुआरों के अधिकारों को समझकर न्यायसंगत फैसला लेना चाहिए।

‘पहले यहां 20 से 30 फीट पानी रहता था, अब मुश्किल से 4-5 फीट पानी मिलेगा’
मछुआरा राजो सहनी कहते हैं कि कावर की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। पहले इसमें 16 गांव का आदमी पलता था। पहले यहां 20 से 30 फीट पानी रहता था, अब मुश्किल से 4-5 फीट पानी मिलेगा। पानी रहने ही नहीं दिया जाता, बसही टूटने से और गेट खोलकर पानी की निकासी करवा दी जाती है। सरकार कुछ समझती ही नहीं है कि 16 गांव के लोग कैसे जीएंगे। काम-धंधा न मिलने से बहुत से लोग गांव छोड़कर परदेस (दूसरे राज्यों) कमाने चले गए हैं।

नाविक और गाइड रामरस कुमार ने बताया कि यहां दूर-दूर से पर्यटक आते हैं, लेकिन रुकने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। न कोई अच्छा होटल है, न ठहरने के लिए कमरा। अगर सरकार आगे बसही में पक्का डैम या गेट बनाकर पानी रोकने की व्यवस्था कर दे, तो झील भी बचेगी और हम लोगों का रोजगार भी।
मछुआरा हरेराम सहनी कहते हैं कि झील में अब सिर्फ जलकुंभी और जंगल भर गया है। बारिश कम होती है और जो पानी आता है वह निकल जाता है। 16 गांवों के अलग-अलग घाट हैं, हर घाट पर 100-200 मछुआरे हैं। जब पानी ही नहीं है तो मछली कहां से आएगी। अब रोहू और बुआरी तो देखने को नहीं मिलती, बस छोटी-मोटी गरई, पोठी, सौरी और सिंघी ही जाल में फंसती हैं। लोग जाल काटकर परदेस में मजदूरी करने को मजबूर हैं।”

