
पटना. कई सपनों को पूरा करने के लिए परिवहन विभाग में स्टेयरिंग थामने आयीं बिहार की बेटियों को सपना एक-एक कर टूटने लगा है. बिहार की पहली पिंक ड्राइवर चार बेटियों ने बस चलाना छोड़ दिया है. पिछले डेढ़ महीने से चार लड़कियां घर में बैठी है. लड़कियों को प्रशिक्षण दिलाने वाली पद्मश्री सुधा वर्गीज ने बताया कि मेरा सपना यही था कि लड़कियों को ड्राइवर का प्रशिक्षण मिले और रोजगार मिले. वह अपने पैर पर खड़े हो जाये. लेकिन, लड़कियों के साथ परिवहन विभाग में ठीक व्यवहार नहीं किया जा रहा है.
छह महीने तक बस चलाने के लिए नहीं दिया
लड़कियों ने बताया कि व्यावासिक वाहन का प्रशिक्षण लेने के बाद भी उन्हें छह महीने तक बस चलाने के लिए नहीं दिया गया. वह दिनभर बस में बैठकर समय बिताती थी. पुरुष ड्राइवरों का व्यवहार बहुत खराब रहता था. कहते थे कि अपने रिस्क पर चलाओ. शरीर में जान नहीं है और चली है बस चलाने. यही नहीं बस की चाबी भी नहीं देते थे. हर दिन पुरुष ड्राइवर और कर्मचारियों के ताने से तंग आ गई. अंत में उन्होंने काम नहीं करने का फैसला लिया.
छह महीने में मात्र तीन महीने का ही वेतन मिला
लड़कियों का कहना है कि पिंक बस नहीं चलाने देने की शिकायत बड़े अधिकारियों से करते थे और डांट पड़ती थी. उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था. लड़कियों के छह महीने में मात्र तीन महीने का ही वेतन मिला. उन्हें अब तक यह भी पता नहीं है कि उन्हें कितना वेतन मिलता था. एक तरफ समय बर्बाद हो रहा था, दूसरी तरफ पढ़ाई भी छूट रहीं थी. बताती है कि स्टेयरिंग चलाने में कभी डर नहीं लगा, लेकिन बस नहीं चलाने को मिलने से उनकी हिम्मत टूट गई.
क्या कहते हैं अधिकारी
"किसी भी लड़की को अगर पिंक बस चलाने नहीं दिया जा रहा है तो सीधे हमसे आकर मिले. उनके पास हैवी मोटरवेहिकल चलाने का लाइसेंस है. उन्हें ही पिंक चलाने दिया जायेगा."
-अरविन्द कुमार, क्षेत्रीय प्रबंधक, बिहार राज्य परिवहन निगम
निगम की ओर से दिलाया गया था प्रशिक्षण
पटना की 16 अनुसूचित जाति की 16 लड़कियों को महिला एवं बाल विकास निगम की ओर से लाइट मोटर व्हीकल चलाने का प्रशिक्षण दिया गया था. इसके बाद महादलित विकास मिशन की ओर से छह लड़कियों को भारी वाहन चलाने का प्रशिक्षण मिला. इसमें एक लड़की की सरकारी नौकरी लग गई. पांच लड़कियां पिंक बस चलाने के लिए चयनित हुई. गणतंत्र दिवस की झांकी में पिंक बस ड्राइवर लड़कियों ने पहला पुरस्कार भी जीता था.
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सबके पास हैवी मोटर व्हीकल का लाइसेंस
इस मौके पर गरीब परिवारों से आने वाली इन बेटियों ने सामाजिक चुनौतियों को पीछे छोड़कर भारी वाहन चलाने का प्रशिक्षण हासिल किया है. औरंगाबाद स्थित ड्राइविंग इंस्टीट्यूट से इन्हें हैवी मोटर व्हीकल (एचएमवी) का लाइसेंस मिला है. इनमें कई ऐसी बेटियां हैं, जिनके सामने कभी कम उम्र में शादी का दबाव था. लेकिन प्रशिक्षण और अवसर मिलने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी की दिशा बदल दी.
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