चुनाव के पहले राजनीतिक पार्टियां जनता को तरह-तरह के प्रलोभन देती हैं। जनता को चुनावी वादों में उलझाया जाता है। लेकिन, चुनाव खत्म होते ही स्थिति बदल जाती है। फिर जनप्रितिनिधियों को न जनता की याद रहती…
चुनाव के पहले राजनीतिक पार्टियां जनता को तरह-तरह के प्रलोभन देती हैं। जनता को चुनावी वादों में उलझाया जाता है। लेकिन, चुनाव खत्म होते ही स्थिति बदल जाती है। फिर जनप्रितिनिधियों को न जनता की याद रहती है और न ही उनसे किए गए वादों की। ऐसी स्वार्थ की राजनीति से न देश का भला होगा, न जनता का। जिनके पास राजनीतिक दूरदर्शिता होगी, देश और जनता के हित में काम करने का जज्बा होगा, वोट उन्हीं को मिलेगा। यह कहना है शहर के उन मतदाताओं का जो मानते हैं अब तक की सरकारों ने रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे प्रमुख मुद्दों पर बातें ज्यादा कीं काम कम। शनिवार को हिन्दुस्तान संवाद : ‘आओ राजनीति करें : अब नारी की बारी’ अभियान में विभिन्न क्षेत्रों से जुटे लोगों ने जनता के मुद्दों पर अपनी बातें रखीं।
मतदाताओं का कहना था कि लोकतंत्र में जनता को जो स्थान और सम्मान मिलना चाहिए, जिन अधिकारों की वह हकदार है, उन्हें सुनिश्चित करने में राजनीतिक पार्टियां विफल रही हैं। संवाद में जनता का गुस्सा नेताओं पर भी उतरा और राजनीतिक पार्टियों पर भी। उनका कहना था कि अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए जनता मारी-मारी फिरती है और उसके वोट से चुनकर सत्ता में काबिज जनप्रतिनिधि राज भोगते हैं। उन्हें जनता के कल्याण की कोई चिंता नहीं रहती। लोगों की नाराजगी इस बात को भी लेकर थी कि नेता और राजनीतिक पार्टियां धर्म, जाति, वर्ग और समुदाय के नाम पर विद्वेष फैलाती हैं। देश को गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा से अभी तक मुक्ति नहीं मिली है, पर राजनीतिक पार्टियां इन मुद्दों को छोड़कर एक-दूसरे पर छींटाकशी करने में लगी हैं। इन्हें जनता की परेशानी से कोई मतलब नहीं है। जनता ऐसे अवसरवादियों को सत्ता की बागडोर नहीं सौंपे, तभी बेहतर राजनीतिक माहौल तैयार होगा। उन्होंने कहा कि जनता को विकास के दिवास्वप्न दिखाने की बजाय, सरकारें ईमानदारी के साथ योजनाओं को लागू कर दें, तो देश भी खुशहाल होगा और जनता भी।
झूठे वादे न किए जाएं
संवाद में आए लोगों ने कहा कि राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणापत्रों के प्रति ईमानदारी बरतें। उनका कहना था कि जनता से ऐसे वादे किए ही क्यों जाते हैं, जो पूर न किए जा सकें। अगर सबको नौकरी नहीं दी जा सकती, तो ऐसी घोषणा ही क्यों की जाती है? उन्होंने तमाम राजनीतिक पार्टियों को निशाने पर लेते हुए कहा कि इनको खुद समीक्षा करनी चाहिए कि अब तक उनके घोषणापत्रों की कितनी बातें पूरी हुईं। आज भी जनता मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। महंगाई पर कोई नियंत्रण नहीं। जनता हर जगह संघर्ष कर रही है। सरकारें योनजाओं की धमाकेदार शुरुआत तो करती हैं, लेकिन जल्द ही ये बीच राह में ही दम तोड़ देती हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता के अधिकार ही हाशिए पर हैं। भ्रष्टाचार, गरीबी, पलायन, महिला सुरक्षा आदि के मुद्दे तमाम राजनीतिक पार्टियां खूब भुनाती हैं, पर इन पर काबू पाने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं किए जाते। उनका कहना था कि विकास के नाम पर आंकड़ेबाजी का खेल खेला जाता है, जिससे जनता का भला नहीं होनेवाला।
लूट रहे निजी शिक्षण संस्थान, सरकारें चुप, स्वास्थ्य सुविधा भी बेहाल
लोगों ने कहा कि हमारी मूल जरूरतें कैसे पूरी हों, यह चिंता का मुख्य विषय है। उनका कहना था कि बेहतर व्यवस्था बहाल करने के लिए अच्छी शिक्षा जरूरी है, जिस पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। शिक्षा सुधरेगी, तो रोजगार की समस्या भी दूर होगी। अभी शिक्षा सरकारी और निजी में बंटी है। सरकारी शिक्षा का हाल बुरा है। स्कूल-कॉलेजों में शिक्षक नहीं हैं, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी कैसे। वहीं, निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ना एक आम आदमी के बूते की बात नहीं। उनका कहना था कि सरकारी शिक्षा तंत्र का हाल बेहाल है, इसलिए निजी शिक्षण संस्थाएं हावी हो रही हैं। ये महंगी फीस वसूलते हैं। उन्होंने रांची के जिला स्कूल का उदाहरण दिया, जहां कभी नामांकन लेना आसान नहीं था, लेकिर इतने गौरवशाली इतिहास के बावजूद आज यह स्कूल उपेक्षित है। चिकित्सा सुविधाओं का भी यही हाल है। सरकारी अस्पतालों में मरीज इलाज और डॉक्टर के लिए मारे-मारे फिरते हैं और निजी अस्पताल आम आदमी को लूटने का काम करते हैं। उन्होंने सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा को बेहतर करने पर जोर दिया।
मध्यम वर्ग की परवाह कब की जाएगी
संवाद में लोगों का गुस्सा इस बात को लेकर फूटा कि सबसे ज्यादा पिसता मध्यम वर्ग है, लेकिन उसकी बेहतरी के लिए कोई योजना नहीं है। उच्च वर्ग साधनसंपन्न है। निम्न वर्ग के लिए सरकारी योजनाएं हैं, जो कमोवेश उनतक पहुंच जाती हैं। लेकिन, मध्यम वर्ग क्या करे? वे कर भी चुकाते हैं, लेकिन सुविधाओं का लाभ उन्हें नहीं मिलता। उनका कहना था कि राजनीतिक पार्टियों ने सबसे ज्यादा इसी वर्ग को ही छला है। उनके लिए न तो सरकारी योजना है और न सुविधा। महंगाई की मार से सबसे ज्यादा त्रस्त मध्यमवर्गीय परिवार ही है। लेकिन सरकारी नीतियों में इस वर्ग की सिरे से उपेक्षा की गई है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी की भी बने, आम आदमी को सम्मान मिले और उसका हक न मारा जाए। विकास के नाम पर जनता को बरगलाया न जाए और न सब्जबाग दिखाया जाएं। प्रलोभन देकर जनता को भ्रमित करने का खेल न खेला जाए। जनता भी उन्हीं को वोट दे जिनकी छवि अच्छी हो और सोच दूरदर्शी। जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बांटनेवालों को जनता खारिज करे।
मुद्दों पर बात करें राजनीतिक पार्टियां
नेताओं की बयानबाजी और एक-दूसरे की जुबानी जंग का मुद्दा भी संवाद में उठा। लोगों का कहना था चुनाव के समय हर राजनीतिक पार्टी खुद को बेहतर साबित करने पर तुली रहती है। ये पार्टियों मुद्दों पर बात नहीं करतीं, बल्कि एक-दूसरे की बखिया उधेड़ने में लगी रहती हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी दूध की धुली नहीं है। कोई पार्टी यह दावा नहीं कर सकती कि उसने जो चुनाव के समय जनता से वादे किए, वे पूरे किए गए। उनका कहना था कि राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे को नीचा दिखाने की बजाय जनता को यह बताएं कि उन्होंने क्या किया। महिलाओं की नाराजगी इस बात पर थी कि सरकारें महिला सुरक्षा के मामले में विफल रही हैं। दुष्कर्म, मानवतस्करी जैसे अपराधों पर कोई लगाम नहीं है। विधि-व्यवस्था लचर है और अपराधी बेलगाम। उनका कहना था कि सरकार किसी की भी बने, वह जनता को सुरक्षित वातावरण दे और उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी हों, यह सुनिश्चित करे। आम जनता का सम्मान हो और भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसी जाए। उन्होंने यह अपील की कि बड़बोले नेताओं को जनता खारिज करे, वोट उन्हीं को दे जिसके पास विकास का रोडमैप हो।
