Friday, May 8, 2026

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खंडोली डैम में मछली पालन से चमकी ग्रामीणों की तकदीर:केज कल्चर और हेचरी से बढ़ा रोजगार, हर साल लाखों रुपए की हो रही आमदनी


गिरिडीह जिले के बेंगाबाद प्रखंड अंतर्गत खंडोली डैम, भोजदाहा और लालपुर क्षेत्र में मत्स्य पालन अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनता जा रहा है। सरकारी योजनाओं, मत्स्य विभाग की पहल और ग्रामीणों की मेहनत ने इस इलाके की पहचान बदल दी है। कभी रोजगार के अभाव में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने वाले लोग अब गांव में ही रहकर मछली पालन के जरिए आत्मनिर्भर बन रहे हैं। इससे न सिर्फ ग्रामीणों की आमदनी बढ़ी है, बल्कि क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। 20 से 25 हजार रुपए तक मासिक आय
स्थानीय किसान सनाउल अंसारी, तैयब अंसारी, कमरुद्दीन, लतीफ, कयूम, लखन रजक, याकूब अंसारी, शमसुद्दीन अंसारी, इब्राहिम अंसारी, ताहिर अंसारी और नईम अंसारी ने बताया कि मत्स्य पालन से गांव के करीब 20 से 25 परिवारों और लगभग 200 लोगों का जीवनयापन हो रहा है। इस कार्य से जुड़े करीब 25 लोग बड़े स्तर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति के पास औसतन 3 से 4 केज हैं, जिनसे प्रति व्यक्ति 20 से 25 हजार रुपए तक मासिक आय हो रही है। वहीं, सभी लोगों की कुल वार्षिक आमदनी लगभग 60 से 70 लाख रुपए तक पहुंच रही है। 200 से अधिक केज लगाए गए हैं
खंडोली डैम और आसपास के जलाशयों में बड़े पैमाने पर केज कल्चर के माध्यम से मछली पालन किया जा रहा है। करीब 200 से अधिक केज लगाए गए हैं, जिनमें विभिन्न प्रजातियों की मछलियों का पालन हो रहा है। मत्स्य विभाग की ओर से मछली के चारे पर प्रति किलो 25 रुपए तक की सब्सिडी दी जा रही है। इसके अलावा समय-समय पर विभाग द्वारा प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, दवा और फीडिंग संबंधी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। 30 किलो तक की बड़ी मछलियां तैयार हो चुकी हैं
ग्रामीणों ने बताया कि मछलियों को तैयार होने में करीब सात महीने का समय लगता है। इसके बाद प्रतिदिन लगभग एक क्विंटल तक मछली उत्पादन किया जाता है। यहां रेहू, कतला, तिलापिया, गोल्डन, चिटल और छोटे झींगा जैसी कई प्रजातियों की मछलियां पाली जा रही हैं। खंडोली क्षेत्र में अब तक 30 किलो तक की बड़ी मछलियां तैयार हो चुकी हैं, जो यहां की सफलता और उत्पादन क्षमता को दर्शाती हैं। स्थानीय बाजारों के अलावा आसपास के कई जिलों में भी यहां की मछलियों की मांग बढ़ रही है। 11 करोड़ मछलियों का बीज तैयार किया जाता है
मत्स्य पालन के साथ-साथ क्षेत्र में संचालित हेचरी भी ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रही है। हेचरी के माध्यम से हर वर्ष करीब 11 करोड़ मछलियों का बीज तैयार किया जाता है। इससे गिरिडीह समेत आसपास के कई जिलों के मछुआरों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराया जाता है। इससे जहां एक ओर स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर मत्स्य उत्पादन को भी नई गति मिली है। युवाओं का रुझान भी स्वरोजगार की ओर बढ़ा
ग्रामीणों का कहना है कि पहले रोजगार के लिए उन्हें दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में ही काम मिलने लगा है। इससे परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और युवाओं का रुझान भी स्वरोजगार की ओर बढ़ा है। कई युवा अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ मत्स्य पालन को भी आय के स्थायी स्रोत के रूप में अपना रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि सरकार और मत्स्य विभाग के सहयोग से गांव में स्वरोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। अगर इसी तरह विभागीय सहायता, प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग मिलता रहा तो आने वाले समय में खंडोली क्षेत्र मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में झारखंड ही नहीं, बल्कि आसपास के राज्यों में भी एक बड़ी पहचान बना सकता है।

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