Wednesday, April 22, 2026

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चारा घोटाला केस, आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई:लालू यादव की जमानत रद्द करने की मांग, सीबीआई ने दायर की है याचिका


चारा घोटाला मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। इस मामले की जांच कर रही CBI ने जमानत को चुनौती देते हुए इसे कानून के खिलाफ बताया है। पिछली सुनवाई में सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल S. V. राजू ने अदालत में दलील दी थी कि लालू यादव को दी गई जमानत कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। इसे रद्द किया जाना चाहिए। वहीं, लालू यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा था कि इस मामले के अन्य आरोपियों को अब तक नोटिस तक जारी नहीं किया गया है, ऐसे में जमानत रद्द करने की मांग उचित नहीं है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह सभी तथ्यों पर विचार कर निर्णय लेगा। अब आज होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। गौरतलब है कि लालू प्रसाद यादव फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनी और राजनीतिक नजरिए से भी काफी अहम माना जा रहा है। क्या है चारा घोटाला? जिसमें लालू यादव दोषी पाए गए चारा घोटाले की शुरुआत छोटे-छोटे मामलों से हुई। इसके बाद यह 55 से ज्यादा मामलों तक जा पहुंचा। हालांकि, बाद में कई केस को मिलाकर एक साथ करने से इसकी संख्या काफी कम हो गई। यह मामला बिहार विभाजन से पहले 1992 से 1995 तक राज्य के सरकारी खजाने से गलत ढंग से 950 करोड़ रुपए निकालने का है। इस दौरान पशुपालन विभाग के अफसरों ने नेताओं की मदद से नकली बिल के जरिए चारा, दवा और कृत्रिम गर्भाधान उपकरण के नाम पर सरकारी खजाने से ये पैसे निकाले। इनमें से 6 मामलों में लालू यादव को आरोपी बनाया गया था। साथ ही बिहार के विभाजन के बाद इनमें से 5 मामले झारखंड में ट्रांसफर कर दिए गए थे। पहली बार यह मामला कब सामने आया? 1979 में जब राम सुंदर दास बिहार के CM थे तभी से पशुपालन विभाग में इस तरह की हेरा-फेरी कर पैसे निकालने के अपुष्ट आरोप लगने लगे थे। 1992 में तत्कालीन विजिलेंस इंस्पेक्टर बिधू भूषण द्विवेदी ने पहली बार लालू और उनके पूर्ववर्ती जगन्नाथ मिश्रा के चारा घोटाले में शामिल होने की पहली रिपोर्ट डायरेक्टर जनरल जी नारायण को सौंपी थी। इंस्पेक्टर बिधू अब कई मामलों में गवाह भी हैं। दिसंबर 1995 में कैग की रिपोर्ट आने के बाद चारा घोटाले की बात लोगों के सामने आई। लालू कुछ महीने पहले ही बिहार के दूसरी बार CM बने थे। उनके पास उस दौरान पशुपालन विभाग था। लालू ने ही कैग की रिपोर्ट भी पेश की थी। कैग की रिपोर्ट में कहा गया था कि पशुपालन विभाग से लालू के कार्यकाल के दौरान बिलों की धोखाधड़ी के जरिए सरकारी खजाने से लगभग 950 करोड़ रुपये निकाले गए। इसके बाद लालू ने सतर्कता विभाग की जांच के आदेश दिए और मामले को विधानसभा की लोक लेखा समिति को भी सौंप दिया। चारा घोटाले में कब जांच के आदेश दिए गए? 1996 में भाजपा नेताओं सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद और सरयू राय तथा असंतुष्ट जनता दल के नेता शिवानंद तिवारी और कांग्रेस नेता प्रेम चंद्र मिश्रा की ओर से हाईकोर्ट में 5 PIL दायर की गईं। इन याचिकाओं को बाद में एक साथ कर दिया गया। मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने PIL के आधार पर CBI को इन अनियमितताओं की जांच का आदेश दिया। 24 जनवरी 1996 को चाईबासा (अब झारखंड में) के खजाने से 37.7 करोड़ रुपए धोखाधड़ी के जरिए निकाले जाने के मामले में पहली FIR दर्ज की गई। इसे पश्चिमी सिंहभूम के उस वक्त के डिप्टी कमिश्नर अमित खरे ने दर्ज कराई थी। इसके बाद अन्य मामलों में भी पूरे बिहार के पुलिस थानों में FIR दर्ज की गईं। इस घोटाले के दौरान बिहार के 4 ट्रेजरी से फर्जी तरीके से पैसे निकाले गए। वे थे दुमका, चाईबासा, डोरंडा और देवघर। लालू यादव के खिलाफ पहली बार कब गिरफ्तारी के आदेश दिए गए? 19 मार्च 1996 को CBI ने राज्यपाल एआर किदवई से CM लालू यादव पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी। जून 1997 में CBI ने लालू और 55 अन्य आरोपियों के खिलाफ चाईबासा मामले में जालसाजी, आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत चार्जशीट दायर की। 25 जुलाई 1997 को एक कोर्ट ने इस मामले में लालू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। इसके बाद लालू ने CM पद से इस्तीफा दे दिया। चारा घोटाले में पहली बार किस मामले में सजा सुनाई गई? लालू को पहली सजा चाईबासा ट्रेजरी से फर्जी तरीके से 37.7 करोड़ रुपए निकाले जाने के मामले में हुई। इस मामले में पूर्व CM लालू यादव और जगन्नाथ मिश्रा तथा राजनेता जगदीश शर्मा, ध्रुव भगत इस मामले के आरोपियों में शामिल थे। 2012 में CBI ने इस मामले में आरोप तय किए। इसके बाद CBI की स्पेशल कोर्ट ने 2013 में लालू समेत 45 आरोपियों को दोषी करार देते हुए 5 साल जेल की सजा सुनाई थी। 23 दिसंबर 2017 को CBI कोर्ट ने लालू को दूसरे मामले में दोषी ठहराया। यह मामला देवघर ट्रेजरी से 80 लाख रुपये से अधिक की अवैध निकासी का था। इस मामले में उन्हें साढ़े तीन साल कैद की सजा सुनाई गई, जबकि जगन्नाथ मिश्रा को बरी कर दिया गया। 24 जनवरी 2018 को लालू को तीसरे मामले में सजा हुई। यह मामला चाईबासा ट्रेजरी से 33.67 करोड़ रुपए फर्जी तरीके से निकालने का था। इस मामले में लालू को 5 साल जेल की सजा सुनाई गई। चौथा केस दुमका ट्रेजरी से फर्जी तरीके से 3.13 करोड़ रुपए निकालने का था। मार्च 2018 में इस मामले में लालू यादव को 7 साल जेल की सजा सुनाई गई। 15 फरवरी 2022 को CBI कोर्ट ने चारा घोटाले के पांचवें केस में लालू यादव को दोषी करार दिया है। यह डोरंडा ट्रेजरी से जुड़ा है। डोरंडा ट्रेजरी से अवैध तरीके से 139.35 करोड़ रुपए निकालने का आरोप है। कोर्ट 21 फरवरी को इस मामले में सजा सुनाया।

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