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तृणमूलीकरण से खुद को बचा पायेगी बंगाल बीजेपी? जानें क्यों मुश्किल है राह

Trinamoolisation of BJP In Bengal: पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद हुए सत्ता परिवर्तन के बाद यहां की राजनीति में विरोधाभास देखने को मिल रहा है. जिस तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर ‘सिंडिकेट राज’, ‘कट मनी’ और ‘तोलाबाजी’ का आरोप लगाकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपना जनाधार बढ़ाया, उसी भाजपा में टीएमसी की संस्कृति के पैर पसारने का खतरा मंडरा रहा है. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व बंगाल कैडर के इस ‘तृणमूलीकरण’ (Trinamoolisation) को रोकने की कोशिश में है, लेकिन यह आसान काम नहीं लग रहा.

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भाजपा के तृणमूलीकरण को रोकने की राह में 4 रोड़े

  1. तृणमूल से आये नेताओं का बड़ा आधार : बीजेपी ने बंगाल में अपने विस्तार के लिए टीएमसी के दर्जनों पूर्व विधायकों, सांसदों और स्थानीय बाहुबलियों को पार्टी में शामिल किया. ‘टीएमसी माइनस ममता बनर्जी’ वाले इस फॉर्मूले के तहत जिन नेताओं को अपनाया गया, उनके साथ उनकी पुरानी कार्यशैली और स्थानीय नेटवर्क भी बीजेपी में आ गया.
  2. धरातल पर प्रशासनिक मजबूरी : बंगाल की राजनीति में पंचायत स्तर तक काम करने के लिए स्थानीय ‘दबंगों’ और उनके नेटवर्क की जरूरत पड़ती है. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि टीएमसी के 15 साल पुराने तंत्र को बिना किसी मजबूत विकल्प के रातोंरात खत्म करने से खुद बीजेपी के लिए शासन चलाना मुश्किल हो सकता है.
  3. बूथ स्तर पर कैडर की कमी : लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बीजेपी के वोट शेयर में भारी उछाल तो देखा गया, लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी के पास अपने समर्पित बूथ एजेंट और कैडर की कमी बरकरार है. इसी वजह से पार्टी को स्थानीय निकायों में दबदबा बनाये रखने के लिए बाहरी तत्वों और टीएमसी के पूर्व कार्यकर्ताओं की मदद लेनी पड़ी.
  4. पार्टी के भीतर उठता असंतोष : पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से चेताया है कि भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. इस बीच, निष्ठावान पुराने कार्यकर्ताओं और नये शामिल हुए नेताओं (रिर्टन वाले गुटों) के बीच वर्चस्व की लड़ाई पार्टी के आंतरिक अनुशासन को प्रभावित कर रही है.

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