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भास्कर न्यूज|लोहरदगा जब देशभर में दुर्गा पूजा और विजयादशमी का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, तब झारखंड की असुर जनजाति के लिए यह शोक का समय होता है। असुर जनजाति महिषासुर को अपना आराध्य पितृपुरुष मानती है। समाज की पारंपरिक मान्यता के अनुसार, महिषासुर धरती के राजा थे। उनका छलपूर्वक वध कर दिया गया था। इसी मान्यता के कारण यह जनजाति नवरात्र से लेकर दशहरा तक शोक मनाती है। इस अवधि में शुभ कार्यों से परहेज करती है। झारखंड के गुमला, पलामू और लातेहार के साथ लोहरदगा में भी असुर जनजाति रहती है। जिले के पेशरार प्रखंड अंतर्गत तेईमु पंचायत के तेईमू गढ़ा में, और किस्को प्रखंड अंतर्गत सेमरडीह में, 15 से 20 परिवार असुर जनजाति के रहते हैं। अन्य जगहों पर सप्तमी की शाम से दशमी तक महिषासुर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। उनकी ”हुड़ुर दुर्गा” के रूप में पूजा की जाती है। लोहरदगा में प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती है। दुर्गा उत्सव भी नहीं मनाया जाता है। इस जाति के लोग शांत रहकर महिषासुर वध का शोक मनाते हैं। असुर समुदाय में प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने की परंपरा नहीं है। दीपावली की रात मिट्टी का छोटा पिंड बनाकर महिषासुर सहित अपने पूर्वजों को याद किया जाता है। तुईमू गांव के सुरेन्द्र असुर, फुदकी असुर आदि बताते हैं कि यह परंपरा शुरू से चली आ रही है। इसे आज भी माना जाता है। अन्य जिलों की तरह महिषासुर की प्रतिमा बनाकर पूजा नहीं होती है। फिर भी इस जाति के लोग महिषासुर वध का शोक जरूर मनाते हैं। उनका मानना है कि महिषासुर का वध छलपूर्वक किया गया था। पाकर पंचायत के पूर्व मुखिया शनिचरवा किसान ने बताया कि पहले इनके पूर्वज यहां प्रतिमा रखकर भी पूजा करते थे। बीते कुछ समय से प्रतिमा रखकर पूजा-अर्चना नहीं होती है। जो परंपरा चली आई है, उसे निभाया जाता है।
दुर्गा पूजा के उत्सव में असुर जनजाति शामिल नहीं होती है , महिषासुर को मानती है आराध्य पितृपुरुष
