Friday, September 18, 2026

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पर्यूषण महापर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना की गई


जैन धर्म के आत्मशुद्धि, संयम और साधना के महापर्व पर्यूषण पर्व का बुधवार को श्रद्धा, भक्ति व धार्मिक उत्साह के साथ शुभारंभ हुआ। दस दिवसीय महापर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना की गई। नगर के दोनों जैन मंदिरों में प्रातःकाल से ही श्रद्धालुओं की विशेष उपस्थिति रही। भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ महापर्व की शुरुआत हुई। महाराष्ट्र से पधारे पंडित प्रशांत भैया जी ने प्रवचन में उत्तम क्षमा धर्म की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल की पहचान है। मन में किसी के प्रति क्रोध, द्वेष या वैरभाव रखना अपने मन को अशांत करता है। क्षमा का भाव अपनाकर व्यक्ति अपने भीतर की अशांति दूर करता है। वह आत्मा की ओर बढ़ता है। उन्होंने कहा कि उत्तम क्षमा का अर्थ केवल दूसरों को क्षमा करना नहीं है। इसका अर्थ अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और वैरभाव को पहचानकर उनका त्याग करना भी है। पर्यूषण पर्व प्रतिदिन आत्मावलोकन करने की प्रेरणा देता है। यह धर्म के दस लक्षणों को जीवन में उतारने का संदेश देता है। बाड़म बाजार स्थित जैन मंदिर में दोपहर में तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ का वाचन किया गया। कार्यक्रम का मंगलाचरण चेलना सेठी ने किया। संध्या बेला में मंदिरों में प्रतिक्रमण, शास्त्र वाचन, प्रवचन, महाआरती व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। आकर्षक विद्युत सज्जा एवं धार्मिक साज-सज्जा से मंदिर परिसर जगमगा उठे। महापर्व को सफल बनाने में जैन युवा परिषद, जैन महिला समाज, जैन महिला समिति व जैन महिला मिलन सहित विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी एवं सदस्य सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। पूरे जैन समाज में पर्व को लेकर उत्साह और भक्ति का वातावरण बना हुआ है। प्रथम दिवस समाजजनों ने क्रोध के स्थान पर क्षमा, कटुता के स्थान पर मधुरता तथा वैर के स्थान पर मैत्री अपनाने का संकल्प लिया। महाआरती के बाद शास्त्र वाचन व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। आगामी दिनों में उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य एवं उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की जाएगी। पर्यूषण पर्व का संदेश है कि क्षमा मांगने और क्षमा करने से मन हल्का होता है। आत्मा निर्मल होती है। इसी आत्मभाव के साथ श्रद्धालु दस दिनों तक धर्म, साधना, संयम व आत्मचिंतन में लीन रहेंगे।

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