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बेगूसराय के जिस शाहपुर गांव में रामधारी सिंह दिनकर यूनिवर्सिटी की घोषणा हुई है, वहां पहुंचने वाली सड़क में गड्ढे ही गड्ढे हैं। एनएच-31 (NH-31) से शाहपुर गांव को जोड़ने वाली महज 1.20 किलोमीटर लंबी इस सड़क पर 500 से भी ज्यादा जानलेवा गड्ढे बने हुए हैं, जबकि सड़क किनारे लगाए गए बोर्ड के अनुसार यह 2022 में बना है। 2022 में करीब 40 लाख रुपये की लागत से बनकर तैयार हुई यह सड़क महज दो साल के भीतर पूरी तरह ध्वस्त होकर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ चुकी है। शाहपुर गांव का यह मुख्य मार्ग केवल एक ग्रामीण रास्ता नहीं है, बल्कि यह इलाके के 10 से 15 गांवों को NH से जोड़ने वाली मुख्य जीवनरेखा है। इस बदहाल रास्ते से रोजाना 20 हजार से अधिक लोग जान जोखिम में डालकर गुजरने को मजबूर हैं। सड़क की स्थिति इतनी भयानक हो चुकी है कि आए दिन दोपहिया वाहन चालक फिसलकर गिर रहे हैं और चार पहिया गाड़ियां गड्ढों में फंसकर दुर्घटनाग्रस्त हो रही हैं। बारिश के दिनों में जब इन 500 से अधिक गड्ढों में गंदा पानी भर जाता है, तो राहगीरों को गड्ढे की गहराई का अंदाजा ही नहीं मिलता और लोग सीधे दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। खस्ताहाल सड़क की 2 तस्वीरें देखिए नेता सिर्फ राजनीति की रोटी सेकते हैं, मेरा पैर टूट गया शाहपुर गांव के रहने वाले गुलशन कुमार ने नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों पर तीखा तंज। गुलशन कुमार ने कहा कि यह सड़क नेताओं के लिए सिर्फ चुनाव के वक्त अपनी राजनीतिक रोटी सेकने का जरिया बनकर रह गई है। पूर्व से लेकर वर्तमान जनप्रतिनिधियों और DM को हम लोग कई बार आवेदन दे चुके हैं। लेकिन हर बार सिर्फ खोखला आश्वासन ही मिला। रोज इस सड़क पर दुर्घटनाएं होती हैं। एक महीने पहले इसी बदहाल सड़क पर एक्सीडेंट होने से मेरा पैर टूट गया था। लंबे समय से इस रास्ते की यही नारकीय स्थिति बनी हुई है। चुनाव जीतने के बाद कोई झांकने तक नहीं आता। इसी रास्ते पर डाइट (DIET) कॉलेज और प्रस्तावित दिनकर विश्वविद्यालय का अस्थाई परिसर है, जहां रोज सैकड़ों छात्र-छात्राएं पढ़ाई करने आते हैं। ‘क्या हम पाकिस्तान के लोग हैं’ सड़क से गुजर रहे मालवाहक वाहन चालक अमित कुमार यादव ने कहा कि इस सड़क पर सिर्फ मुसीबतें ही मुसीबतें हैं। बरसात में पानी भरा रहने के कारण गड्ढों का अंदाजा ही नहीं लगता। गाड़ियां इन गड्ढों में कूद जाती हैं, उनके पार्ट्स टूट जाते हैं। इस रास्ते पर आने की इच्छा बिल्कुल नहीं होती, लेकिन मजबूरी में आना पड़ता है। क्या हम पाकिस्तान के नागरिक हैं, हम भी इसी देश के जनता हैं, सरकार को वोट देते हैं। फिर भी हमारे इलाके की कोई सुध लेने वाला नहीं है। दिनकर विश्वविद्यालय की उम्मीदों पर गड्ढों का ग्रहण राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के नाम पर बेगूसराय में विश्वविद्यालय की स्थापना क्षेत्र के लोगों के लिए एक ऐतिहासिक सौगात है। लेकिन जिस गांव में इसके अस्थाई परिसर की शुरुआत की तैयारी चल रही है, वहां पहुंचने का रास्ता ही अगर मौत का कुआं बना रहे, तो छात्र, प्रोफेसर और आम लोग कैसे सुरक्षित पहुंचेंगे। स्थानीय महिलाओं, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों के लिए यह सड़क रोज जलालत झेलने का कारण बन चुकी है। सड़क की ऐसी दुर्दशा देख रोना आता है भाजपा मंडल उपाध्यक्ष मानस रंजन सिंह ने अपनी ही सरकार के खिलाफ तीखी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि इस सड़क की दुर्दशा को देखकर बहुत रोना आता है। राजकुमार सिंह के कार्यकाल में यह सड़क मेंटेनेंस के नाम पर बनी थी। आज स्थिति यह है कि न तो इस पर किसी मरीज को ले जाया जा सकता है, न खुद चला जा सकता है और न ही बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई और रोजमर्रा की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि यह सड़क पिछले 5 सालों से मेंटेनेंस के नाम पर कागजों पर रोज बन रही है और इस पर काम का नाटक चल रहा है। सड़क नेशनल हाईवे (NH) से निकलकर शाहपुर होते हुए सुदूर ग्रामीण इलाकों को जोड़ती है। यह साफापुर, मीनापुर, दरियापर, पनसल्ला, नदी किनार, चाक, छितनौर और पुनर्वास जैसे कई गांवों का मुख्य संपर्क मार्ग है। हमारे गांव शाहपुर में दिनकर विश्वविद्यालय खुल रहा है। इसके लिए मैं बिहार सरकार और केंद्र सरकार दोनों को धन्यवाद देता हूं। लेकिन दुख की बात यह है कि जहां दिनकर विश्वविद्यालय बनने जा रहा है, उस गांव की सड़क की यह हालत है! विश्वविद्यालय जाने वाले लोग भी तो इसी रास्ते से गुजरेंगे, क्योंकि यही एकमात्र वैकल्पिक मार्ग है। शाहपुर गांव दानदाताओं का गांव रहा है। पूरे बिहार में शायद ही कोई ऐसा गांव हो जहां हमारे गांव के पढ़े-लिखे 5 शिक्षक न पढ़ाते हों। यहां डाइट (शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय) स्थित है, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने 35-40 बीघा जमीन दान दी थी। खुद मेरे दादाजी ने 6 बीघा जमीन दान की थी। अभी सवा किलोमीटर की सड़क में गड्ढे गिनना मुश्किल है, कम से कम 400 से 500 गड्ढे हैं। आप खुद देख सकते हैं। बूथ जिताकर भेजते हैं, एंबुलेंस चलने लायक भी सड़क नहीं मानस रंजन सिंह ने कहा कि हमारी पार्टी की सरकार है, फिर भी मुझे तरस आ रहा है। आज लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जमीनी सड़क की सुध लेने वाला कोई नहीं है। मुख्यमंत्री जी हम पार्टी के सच्चे कार्यकर्ता हैं। हम अपने दम पर बूथ, पंचायत और मंडल जिताकर भेजते हैं। आज हमारे बच्चे कैसे पढ़ने जाएंगे, हमारी मां-बहनें कैसे चलेंगी। मरीजों को खाट पर लादकर ले जाना पड़ता है। शाहपुर में अब एंबुलेंस चलने लायक सड़क भी नहीं बची है।
बेगूसराय- प्रस्तावित दिनकर यूनिवर्सिटी वाले रास्ते में 500 गड्ढे:लोग बोले- 2022 में 40 लाख में बनी थी सड़क, 1.20 किलोमीटर रोड पर बनी जानलेवा

