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भागलपुर कोर्ट के मुख्य गेट पर बुधवार को पुलिस ने एक वकील को अरेस्ट किया है। आरोप है कि कार्रवाई दौरान कथित तौर पर घसीटते हुए पुलिस अपने साथ ले गई। इस घटना के बाद अधिवक्ताओं में भारी नाराजगी देखने को मिली। जिला विधिक संघ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कार्रवाई के तरीके का कड़ा विरोध किया है। बताया जा रहा है कि वकील सुबोध कृष्ण दास के खिलाफ लगभग 13 साल पुराना एक मामला लंबित है। पुलिस उन्हें काफी समय से तलाश रही थी। सूचना मिली थी कि कोर्ट परिसर के गेट के आसपास मौजूद हैं, जिसके बाद तातारपुर थाना की पुलिस मौके पर पहुंची। इसी दौरान तनाव की स्थिति उत्पन हो गई। जब पुलिस ने अधिवक्ता को उनके काले कोट और पेशेवर पोशाक में कथित तौर पर घसीटते हुए हिरासत में लिया। घटना की जानकारी मिलते ही अधिवक्ताओं में आक्रोश फैल गया और पुलिस की कार्रवाई के तरीके पर गंभीर सवाल उठने लगे। जिला विधिक संघ के महासचिव अंजनी कुमार ने पुलिस की कार्रवाई पर नाराजगी जताते हुए कहा कि किसी अधिवक्ता के खिलाफ मामला दर्ज होने या गिरफ्तारी की स्थिति में बार संघ को भी जानकारी दी जानी चाहिए थी। यदि पुलिस संघ को मामले और वारंट की जानकारी देती, तो संघ कानून की प्रक्रिया में सहयोग करता। पुराने मामले में पुलिस ने की कार्रवाई पुलिस की ओर से बताया गया कि अधिवक्ता सुबोध कृष्ण दास के खिलाफ एक पुराना मामला लंबित है। वह लंबे समय से पुलिस की गिरफ्त से बाहर थे। पुलिस के अनुसार न्यायालय से लगातार दबाव और मामले को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रिया के बीच कार्रवाई की गई है। पुलिस का दावा है कि कार्रवाई किसी नए विवाद के कारण नहीं, बल्कि पुराने मामले में लंबित कार्रवाई के तहत की गई है। क्या गिरफ्तारी से पहले बार संघ को सूचना देना जरूरी था? घटना के बाद अधिवक्ताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस को कार्रवाई से पहले जिला विधिक संघ के पदाधिकारियों को सूचना देनी चाहिए थी। बार संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि उन्हें पहले सूचना दी जाती तो वे संबंधित अधिवक्ता को कानूनी प्रक्रिया के तहत आत्मसमर्पण कराने अथवा जमानत की प्रक्रिया में सहयोग कर सकते थे। अधिवक्ता संघ का आरोप है कि न तो संघ के अध्यक्ष-सचिव को पूर्व सूचना दी गई और न ही ऐसी कोई जानकारी साझा की गई, जिससे मामले को शांतिपूर्ण तरीके से कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जा सके। कार्रवाई का विरोध नहीं, तरीके पर सवाल अधिवक्ता संघ ने स्पष्ट किया है कि वह कानून की प्रक्रिया और न्यायालय के आदेश का विरोध नहीं कर रहा है। यदि किसी अधिवक्ता के खिलाफ मामला लंबित है और अदालत का आदेश है, तो कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन संघ का कहना है कि कानून का पालन कराने के नाम पर किसी अधिवक्ता की गरिमा को ठेस पहुंचाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। संघ के पदाधिकारियों के मुताबिक पूरे मामले के तथ्यों और संबंधित अधिवक्ता के आचरण की भी जांच की जा रही है। साथ ही पुलिस की कार्रवाई के तरीके को लेकर संघ की ओर से आगे कड़ा विरोध दर्ज कराया जा सकता है। समाहरणालय गेट पर हुई कार्रवाई बनी चर्चा का विषय समाहरणालय और न्यायालय परिसर के आसपास दिनभर यह घटना चर्चा का विषय बनी रही। मौके पर मौजूद लोगों और अधिवक्ताओं के बीच पुलिस की कार्रवाई को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं। मामला अब सिर्फ एक अधिवक्ता की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस कार्रवाई की प्रक्रिया, अधिवक्ताओं की गरिमा और बार-पुलिस समन्वय को लेकर बड़ा सवाल बन गया है।
