किशनगंज से गौरव कुमार की रिपोर्ट
Rail Line Project: बिहार के सीमांचल और पूर्वोत्तर भारत को जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण जालालगढ़-किशनगंज नई रेल लाइन परियोजना के दिन अब बहुरने वाले हैं. वर्ष 2008-09 में स्वीकृत होने और बाद में वर्ष 2019 में तकनीकी व बजटीय कारणों से ठप पड़ी इस योजना को केंद्र सरकार ने ग्रीन सिग्नल दे दिया है. वर्तमान में रेलवे बोर्ड और उत्तर पूर्वी सीमांत रेलवे (NFR) द्वारा इसकी संशोधित लागत का अंतिम मूल्यांकन किया जा रहा है. इस परियोजना के दोबारा शुरू होने से पूर्णिया प्रमंडल के बाढ़ प्रभावित सुदूर ग्रामीण इलाकों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदलने की उम्मीद जगी है, जिससे स्थानीय व्यापार और किसान सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे.
₹360 करोड़ से बढ़कर ₹1852 करोड़ हुई लागत; 51.632 किमी लंबे रूट पर बनेंगे 8 स्टेशन
इस बहुप्रतीक्षित रेल परियोजना के बजटीय और भौगोलिक कड़ियों का पूरा ब्यौरा निम्नलिखित है:
- लागत में भारी इजाफा: इस परियोजना का शिलान्यास वर्ष 2008-09 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने किया था, तब इसकी अनुमानित लागत मात्र 360 करोड़ रुपये थी. लेकिन 17 वर्षों की प्रशासनिक लेटलतीफी और जमीन अधिग्रहण के पेंच के कारण इसकी संशोधित लागत अब बढ़कर 1852 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है.
- परियोजना की लंबाई: प्रस्तावित नई सिंगल/डबल ब्रॉडगेज रेल लाइन की कुल लंबाई 51.632 किलोमीटर होगी.
- प्रस्तावित रूट नेटवर्क: यह रेल लाइन पूर्णिया के जालालगढ़ जंक्शन से शुरू होकर अमौर, बैसा, रौटा, खाताहाट और महीनगांव जैसे सघन आबादी वाले ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों को चीरते हुए किशनगंज मुख्यालय से जुड़ेगी.
- 8 नए स्टेशन: इस पूरे 51 किलोमीटर के खंड में ग्रामीण यात्रियों की सुविधा के लिए कुल 8 नए रेलवे स्टेशनों के निर्माण का खाका तैयार किया गया है.
पूर्णिया में 1928 के बाद पहली बार बिछेगी नई पटरी; टूटेगा एक सदी का सूखा
विष्णुपुर काली और अमौर क्षेत्र के रेल इतिहास के लिहाज से यह परियोजना एक स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने वाला अध्याय साबित होने वाली है:
ऐतिहासिक फैक्ट: “पूर्णिया जिले में आखिरी बार 15 सितंबर 1928 को पूर्णिया-मुरलीगंज रेलखंड पर ट्रेनों का परिचालन शुरू हुआ था. उसके बाद से लेकर अब तक (लगभग 100 वर्षों में) जिले की भौगोलिक सीमा के भीतर एक इंच भी नई रेल लाइन नहीं बिछाई गई है.”
यदि जालालगढ़-किशनगंज परियोजना का सिविल कार्य समय पर शुरू होता है, तो पूर्णिया जिला लगभग एक शताब्दी बाद अपने क्षेत्र में नई पटरियों पर ट्रेन दौड़ने का गौरवमयी गवाह बनेगा.
मुकुरिया-किशनगंज रूट का लोड होगा कम; एनजेपी के लिए मिलेगा नया विकल्प
रेलवे के परिचालन विंग (Operating Wing) के अनुसार, इस बाईपास और नई रेल कड़ियों के दूरगामी फायदे इस प्रकार हैं:
- वैकल्पिक रेल मार्ग: वर्तमान में न्यू जलपाईगुड़ी (NJP) से कटिहार जाने वाली ट्रेनों को एक लंबे रूट से होकर गुजरना पड़ता है. इस लाइन के बनने से ट्रेनों को सीधे पूर्णिया (जालालगढ़) होकर चलाने का एक शॉर्टकट और सुलभ विकल्प मिल जाएगा.
- दबाव से मुक्ति: इस नई कड़ियों के जुड़ने से वर्तमान के अत्यधिक व्यस्त मुकुरिया-किशनगंज रेलखंड पर यात्री और मालगाड़ियों का दबाव काफी हद तक कम हो जाएगा, जिससे वीआईपी ट्रेनों के समय पालन (Punctuality) में सुधार होगा.
‘चिकन नेक’ के लिए रणनीतिक कवच और बाढ़ पीड़ितों के लिए लाइफलाइन
आर्थिक लाभ से इतर यह परियोजना सामरिक (Strategic) दृष्टिकोण से भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय के लिए गेमचेंजर मानी जा रही है. यह लाइन पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले बेहद संवेदनशील और संकरे ‘चिकन नेक’ (सिलिगुड़ी कॉरिडोर) के समानांतर एक मजबूत वैकल्पिक सैन्य परिवहन मार्ग उपलब्ध कराएगी, जिससे आपातकाल या युद्ध जैसी कड़ियों में सेना की आवाजाही निर्बाध रह सकेगी.
इसके अलावा, हर साल महानंदा और कनकई नदी की विभीषिका झेलने वाले अमौर और बैसा प्रखंड के किसानों को अब अपनी मक्का, जूट और धान की फसलों को सीधे सिलीगुड़ी, कोलकाता और दिल्ली की बड़ी मंडियों तक भेजने के लिए एक सस्ता और बारहमासी सुरक्षित साधन मिल जाएगा, जिससे सीमांचल के पिछड़ेपन की कड़ियों को हमेशा के लिए तोड़ा जा सकेगा.

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