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झारखंड की माटी की खुशबू और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक ‘सोहराई कला’ आज सीमाओं को लांघकर वैश्विक मंच पर अपनी धाक जमा रही है। कभी हजारीबाग, संथाल परगना, कोल्हान और रांची के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं द्वारा केवल घर की कच्ची मिट्टी की दीवारों पर उकेरी जाने वाली यह लोककला अब कैनवास, कागज और कपड़ों (साड़ियों व दुपट्टों) तक पहुंच चुकी है। ग्रामीण कलाकारों का कहना है, ‘सोहराई सिर्फ चित्रकारी नहीं, बल्कि प्रकृति और पशु-पक्षियों के प्रति हमारी आस्था है। जब हमारी पेंटिंग्स विदेश जाती हैं, तो लगता है झारखंड की माटी का मान बढ़ा है। इस्को गुफा से ग्लोबल मार्केट तक का सफर प्राचीन पहचान : हजारीबाग की हजारों साल पुरानी इस्को शैलचित्र गुफाओं में सोहराई-कोहबर के प्राचीन साक्ष्य मिलते हैं।
प्राकृतिक रंग : दुधिया, सफेद, लाल, काली, पीली मिट्टी और गोबर के घोल से इसके सभी प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते हैं।
आधुनिक बदलाव : अब सिल्क साड़ियों, कुर्ते, हैंडबैग व होम डेकोर प्रोडक्ट्स पर चित्रण ।
ग्लोबल डिमांड : सोहराई कला को जीआई टैग मिलने के बाद यूरोप, अमेरिका,खाड़ी देशों में मांग।
