गोपालगंज जिले के सबसे बड़े अस्पताल को कागजों पर ‘मॉडल अस्पताल’ का दर्जा दिया गया है, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। लगभग 38 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह अस्पताल आज खुद ‘बीमार’ नजर आ रहा है, जिससे 30 लाख की आबादी को सीधा लाभ मिलने का दावा अधूरा रह गया है। अस्पताल का निर्माण मरीजों को तत्काल इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश यहां आज भी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। इसका सीधा खामियाजा यहां आने वाले गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है, जो पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं से वंचित हैं। निजी अस्पतालों या अन्य शहरों पर निर्भर पेशेंट ‘मॉडल अस्पताल’ का तमगा मिलने के बावजूद यहां कई महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। ईएनटी, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, साइकेट्रिस्ट, चर्म रोग, न्यूरोलॉजी और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों या अन्य शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है। रात में महिला चिकित्सकों की अनुपलब्धता से प्रसूता महिलाओं को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। न्यूरो, ईएनटी और स्किन जैसे विशेषज्ञ सालों से उपलब्ध नहीं हैं। कई विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त पड़े हैं या उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। डॉक्टरों के साथ-साथ जीएनएम और अन्य नर्सों की संख्या में भी भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे मरीजों की देखभाल प्रभावित होती है। 24 स्वीकृत पदों में से केवल 15 डॉक्टर ही कार्यरत इस अस्पताल में सामान्य डॉक्टरों के कुल 24 स्वीकृत पदों में से केवल 15 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। फिजिशियन के 4 स्वीकृत पदों में से 1सर्जन के 3 में से 1, गायनी के 8 में से 5, एनेस्थीसिया के 8 में से 1, नेत्र रोग विशेषज्ञ के 2 में से 1 मौजूद है। वहीं, ईएनटी के 2, रेडियोलॉजिस्ट के 5, पैथोलॉजिस्ट के 1 और साइकेट्रिस्ट के 1 स्वीकृत पद पूरी तरह खाली हैं।क्लर्क के 74 स्वीकृत पदों में से 53 पद भी रिक्त हैं। जीएनएम के 200 स्वीकृत पदों में से 96 खाली हैं, जिनमें से 77 कार्यरत हैं और19 जीएनएम प्रतिनियुक्ति पर हैं। इसके अलावा, अस्पताल आधुनिक जांच उपकरणों की समस्या से भी जूझ रहा है।अव्यवस्था और डॉक्टरों के ड्यूटी से गायब रहने पर समय-समय पर जिलाधिकारी द्वारा औचक निरीक्षण कर कार्रवाई भी की जाती है। अस्पताल प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते संसाधनों और डॉक्टरों की इस कमी के कारण यह मॉडल अस्पताल केवल ‘प्राथमिक उपचार केंद्र’ या मरहम-पट्टी तक ही सीमित होकर रह गया है। दुर्घटना या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में अस्पताल प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते हैं। नतीजतन, आपातकालीन स्थिति में अधिकांश मरीजों को बेहतर इलाज के लिए तुरंत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर या राजधानी पटना के लिए रेफर कर दिया जाता है।रेफर किए गए मरीजों में से कई आर्थिक रूप से इतने कमजोर होते हैं कि वे बाहर के महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते। वहीं, कई मरीज तो रास्ते की लंबी दूरी तय करते-करते दम तोड़ देते हैं।
गोपालगंज मॉडल अस्पताल कागजों पर, जमीन पर सुविधाओं की कमी:38 करोड़ की लागत के बावजूद एक्सपर्ट डॉक्टरों की कमी
गोपालगंज जिले के सबसे बड़े अस्पताल को कागजों पर ‘मॉडल अस्पताल’ का दर्जा दिया गया है, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। लगभग 38 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह अस्पताल आज खुद ‘बीमार’ नजर आ रहा है, जिससे 30 लाख की आबादी को सीधा लाभ मिलने का दावा अधूरा रह गया है। अस्पताल का निर्माण मरीजों को तत्काल इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश यहां आज भी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। इसका सीधा खामियाजा यहां आने वाले गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है, जो पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं से वंचित हैं। निजी अस्पतालों या अन्य शहरों पर निर्भर पेशेंट ‘मॉडल अस्पताल’ का तमगा मिलने के बावजूद यहां कई महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। ईएनटी, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, साइकेट्रिस्ट, चर्म रोग, न्यूरोलॉजी और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों या अन्य शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है। रात में महिला चिकित्सकों की अनुपलब्धता से प्रसूता महिलाओं को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। न्यूरो, ईएनटी और स्किन जैसे विशेषज्ञ सालों से उपलब्ध नहीं हैं। कई विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त पड़े हैं या उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। डॉक्टरों के साथ-साथ जीएनएम और अन्य नर्सों की संख्या में भी भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे मरीजों की देखभाल प्रभावित होती है। 24 स्वीकृत पदों में से केवल 15 डॉक्टर ही कार्यरत इस अस्पताल में सामान्य डॉक्टरों के कुल 24 स्वीकृत पदों में से केवल 15 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। फिजिशियन के 4 स्वीकृत पदों में से 1सर्जन के 3 में से 1, गायनी के 8 में से 5, एनेस्थीसिया के 8 में से 1, नेत्र रोग विशेषज्ञ के 2 में से 1 मौजूद है। वहीं, ईएनटी के 2, रेडियोलॉजिस्ट के 5, पैथोलॉजिस्ट के 1 और साइकेट्रिस्ट के 1 स्वीकृत पद पूरी तरह खाली हैं।क्लर्क के 74 स्वीकृत पदों में से 53 पद भी रिक्त हैं। जीएनएम के 200 स्वीकृत पदों में से 96 खाली हैं, जिनमें से 77 कार्यरत हैं और19 जीएनएम प्रतिनियुक्ति पर हैं। इसके अलावा, अस्पताल आधुनिक जांच उपकरणों की समस्या से भी जूझ रहा है।अव्यवस्था और डॉक्टरों के ड्यूटी से गायब रहने पर समय-समय पर जिलाधिकारी द्वारा औचक निरीक्षण कर कार्रवाई भी की जाती है। अस्पताल प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते संसाधनों और डॉक्टरों की इस कमी के कारण यह मॉडल अस्पताल केवल ‘प्राथमिक उपचार केंद्र’ या मरहम-पट्टी तक ही सीमित होकर रह गया है। दुर्घटना या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में अस्पताल प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते हैं। नतीजतन, आपातकालीन स्थिति में अधिकांश मरीजों को बेहतर इलाज के लिए तुरंत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर या राजधानी पटना के लिए रेफर कर दिया जाता है।रेफर किए गए मरीजों में से कई आर्थिक रूप से इतने कमजोर होते हैं कि वे बाहर के महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते। वहीं, कई मरीज तो रास्ते की लंबी दूरी तय करते-करते दम तोड़ देते हैं।

