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Adopted indigenous methods in the field, earned 23 thousand rupees from an investment of 3,800

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मेहनत, सही तकनीक और स्थानीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो, तो कम जमीन में भी खेती मुनाफे का सौदा बन सकती है। पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर प्रखंड के बिन्दासोरजोम गांव के किसान मंझी सामद ने प्राकृतिक खेती अपनाकर इसे साबित किया है। उन्होंने महज 3,800 रुपए की लागत से मिश्रित सब्जियों की खेती की और 23 हजार रुपए की कुल आय अर्जित की। खर्च निकालने के बाद उन्हें 19,200 रुपए का शुद्ध लाभ हुआ। मांझी सामद ने फरवरी 2026 में करीब 50 डिसमिल जमीन पर मिश्रित सब्जी की खेती शुरू की थी। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत मिले प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन ने उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने खेत में लौकी, करेला, तोरई, नेनुआ, खीरा और टमाटर की खेती की। एक ही खेत में कई तरह की सब्जियां उगाने से उन्हें अलग-अलग फसलों से आमदनी का अवसर मिला।

पहले मंझी सामद खेती में रासायनिक खाद और महंगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते थे। इससे खेती की लागत बढ़ रही थी। इसके बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती की तकनीक अपनाई और खेत में ही स्थानीय संसाधनों से कृषि उत्पाद तैयार करने शुरू किए। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए जीवामृत और सुपर कम्पोस्ट का उपयोग किया। वहीं, कीट एवं रोग नियंत्रण के लिए नीमास्त्र और अग्निअस्त्र का इस्तेमाल किया। पौधों की वृद्धि के लिए अंडा टॉनिक भी अपनाया। इन उपायों से बाहरी कृषि सामग्री पर निर्भरता कम करने और कम खर्च में फसल उत्पादन करने में मदद मिली। प. सिंहभूम के उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा कि किसानों को कम लागत वाली, टिकाऊ और लाभकारी कृषि पद्धतियों से जोड़ना जरूरी है। प्राकृतिक खेती से स्थानीय संसाधनों का उपयोग बढ़ाने, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करने और रासायनिक कृषि सामग्री पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन का प्रयास है कि किसानों को योजनाओं के माध्यम से प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और आधुनिक कृषि पद्धतियों की जानकारी मिले। { मिश्रित सब्जी की खेती के पूरे मौसम में मंझी सामद ने 13 बार तुड़ाई की। इस दौरान करीब 6 क्विंटल सब्जियों का उत्पादन हुआ। लौकी की बिक्री से उन्हें 12 हजार रुपए मिले, जबकि अन्य सब्जियों को बेचकर 11 हजार की आय हुई। कुल आमदनी 23 हजार रुपए रही। {खेती में भूमि की तैयारी पर 1,000 रुपए, बीज पर 1,200 रुपए, प्राकृतिक कृषि उत्पादों पर 800 रुपए और श्रम पर 800 रुपए खर्च हुए। कुल लागत 3,800 रुपए आई। बिक्री से मिली राशि में से लागत घटाने पर 19,200 रुपए का शुद्ध लाभ हुआ।

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