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गुमला नगर परिषद में टेंडर को लेकर चल रहा विवाद अब एक बड़े गतिरोध में बदल गया है। इस विवाद के कारण शहर का विकास कार्य पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गया है। मामले में ताजा मोड़ तब आया जब नगर परिषद की अध्यक्ष शकुंतला उरांव ने आधिकारिक पत्र जारी कर 9 जुलाई से कार्यालय की सभी सेवाओं और कार्यों (केवल एसआईआर को छोड़कर) को अनिश्चित काल के लिए बंद करने का ऐलान कर दिया है। अध्यक्ष द्वारा कार्यपालक पदाधिकारी को लिखे पत्र के अनुसार नगर परिषद द्वारा निकाली गई साढ़े पांच करोड़ की 32 योजनाओं की निविदा से जुड़ी गंभीर समस्याओं को लेकर 2 जुलाई को खुद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और वार्ड पार्षदों ने उपायुक्त के समक्ष उपस्थित होकर अपनी बात रखी थी। अध्यक्ष का आरोप है कि इस बैठक को बीते कई दिन हो चुके हैं। लेकिन अब तक उपायुक्त द्वारा इस संबंध में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है और न ही परिषद को किसी प्रकार की सूचना दी गई है। पत्र में नाराजगी जताते हुए कहा गया है कि उपायुक्त की यह उदासीनता जन प्रतिनिधियों की मांगों की अनदेखी करने और नगर परिषद के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने जैसी है। इसी से क्षुब्ध होकर परिषद ने तालाबंदी जैसा कड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। अब देखना यह है कि अध्यक्ष की इस चेतावनी के बाद जिला प्रशासन और उपायुक्त इस मामले में क्या मध्यस्थता करते हैं ताकि टेंडर का यह पेच सुलझ सके और शहर का विकास कार्य पटरी पर लौट सके।
प्रशासनिक और राजनीतिक घमासान के बीच सबसे बुरी मार स्थानीय ठेकेदारों पर पड़ रही है। टेंडर विवाद और उसके बाद शुरू हुई जांच के नाम पर कई चालू विकास कार्यों को बीच में ही रुकवा दिया गया है। ठेकेदारों का कहना है कि काम बंद होने से उन्हें रोजाना भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है। साइट पर मंगाई गई निर्माण सामग्री खराब हो रही है और मजदूरों को बिना काम के भुगतान करना पड़ रहा है या वे काम छोड़कर जा रहे हैं। ठेकेदारों में इस बात को लेकर भारी असमंजस है कि आखिर यह विवाद कब सुलझेगा और वे अपना काम दोबारा कब शुरू कर पाएंगे। जांच पूरी, पर रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं: बताया जा रहा है कि टेंडर की जांच हो चुकी है। लेकिन अभी तक अधिकारिक तौर पर जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। डीसी, विधायक और नगर परिषद के बीच मध्यस्थ कराने की कोशिश में है। ताकि विकास प्रभावित न हो। पर अब तक वे सफल नहीं हो सके है।
