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सरकारी भवनों और दफ्तरों को अब मुफ्त की बिजली नहीं मिलेगी, रिचार्ज नहीं कराया तो कटेगी बिजली झारखंड में सरकारी दफ्तरों में मुफ्त की बिजली के दिन अब खत्म होने वाले हैं। केंद्र सरकार ने अल्टीमेटम दिया है कि अगर 31 अगस्त तक सभी सरकारी भवनों और दफ्तरों में प्रीपेड स्मार्ट मीटर नहीं लगे तो केंद्र की पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस) के तहत मिलने वाला करीब 3000 करोड़ रु.का फंड रोक दिया जाएगा। केंद्र ने यह भी साफ कर दिया है कि अब डिस्कॉम कंपनियों (बिजली वितरण कंपनी) को अपना घाटा कम करना होगा। एटीएंडसी लॉस घटाना होगा। अभी राज्य में सरकारी भवनों और दफ्तरों पर 1400 करोड़ रुपए से अधिक का बकाया है। केंद्र सरकार के इस अल्टीमेटम के बाद झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (जेबीवीएनएल) रेस हो गया है। बिलिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। क्या है आरडीएसएस योजना आरडीएसएस यानी पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इसे वर्ष 2021 में लॉन्च किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बिजली वितरण कंपनियों की माली हालत सुधारना और आम जनता को निर्बाध बिजली देना है। इसके तहत पहले फेज में स्मार्ट प्रीपेड मीटर और एलटी लाइन (घरेलू बिजली पहुंचाने के नंगे तार) को एरियल बंच केबल में बदलना है। दूसरे फेज में अंडरग्राउंड केबलिंग और 33 केवी लाइन की दूरी को कम करना और कमजोर लाइन को मजबूत करना है। इसके लिए केंद्र सरकार राज्यों को फंड देती है। झारखंड में अभी पहले फेज का काम चल रहा है। किस सरकारी विभाग पर कितना बकाया
राज्य के 31 से अधिक विभाग और सरकारी दफ्तरों पर जेबीवीएनएल का 1400 करोड़ रुपए से अधिक बकाया है। सबसे ज्यादा 448 करोड़ शहरी विकास एवं आवास विभाग पर है। वहीं 380 करोड़ रुपए पेयजल एवं स्वच्छता विभाग पर और 302 करोड़ रुपए एचईसी पर बकाया है। इसके अलावा कई विभागों पर भी भारी-भरकम राशि बकाया है। लाइन लॉस: 10 राज्यों में सबसे ज्यादा हम
राज्यों के अनुसार बिजली नुकसान (ATC Loss) का विवरण जानिए…जेबीवीएनएल की स्थिति
बिलिंग एफिशिएंसी 71.81%, यानी 28% बिजली का अता-पता नहीं :
जेबीवीएनएल जितनी बिजली खरीदकर सप्लाई करता है, उसमें सिर्फ 71.81% बिजली का ही बिल बना पाता है। शेष 28% बिजली का कोई अता-पता नहीं रहता। देश की जिन 65 बिजली कंपनियों की रेटिंग की गई, उनमें झारखंड सबसे निचले (65वें) पायदान पर है। इसका मतलब है कि देश में सबसे ज्यादा बिजली की बर्बादी या चोरी झारखंड में ही हो रही है। कलेक्शन एफिशिएंसी 90.33%, शेष सरकारी दफ्तरों व रसूखदारों के पास बकाया: जो 71.81% बिल सरकारी रिकॉर्ड में बनते हैं, उन उपभोक्ताओं से 100 रु. के बिल के बदले बिजली विभाग सिर्फ 90.33 रु. ही वसूल पाता है। बाकी के पैसे सरकारी दफ्तरों, रसूखदारों और आम उपभोक्ताओं के बकाए में चले जाते हैं। जबकि देश का राष्ट्रीय औसत 97% है।
समग्र रैंकिंग… 54 बिजली वितरण कंपनियों में 53वें स्थान पर जेबीवीएनएल, ग्रेड-सी: देश की 54 बिजली वितरण कंपनियों के काम, मुनाफे, घाटे और परफॉर्मेंस को आंका गया तो जेबीवीएनएल नीचे से दूसरे स्थान पर रहा। नतीजा यह हुआ कि खराब प्रदर्शन के कारण केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने झारखंड को सी कैटेगरी में डाल दिया।
यह डेटा वित्तीय वर्ष 2024-25 का है। वित्तीय वर्ष 2025-26 का डेटा अभी अपडेट नहीं किया गया है। सरकारी भवनों में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने का काम जारी है। रांची में करीब 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। अन्य शहरों में भी जारी है। सभी एजेंसियों को निर्देश दिया गया है कि केंद्र की गाइडलाइन के तहत 31 अगस्त तक इसे पूरा करे। हम इस लक्ष्य को निश्चित रूप से हासिल करेंगे। -पीके श्रीवास्तव, निदेशक वितरण एवं परियोजना, जेबीवीएनएल

