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कोडरमा के अजीत की संघर्ष-समर्पण की कहानी:कैंसर से पत्नी की हुई मौत, जीने के लिए थे दो ऑप्शन; मैंने बेटियों को चुना


झुमरीतिलैया की गलियों में एक साधारण सा दिखने वाला घर आज एक असाधारण कहानी को समेटे हुए है। यहां रहने वाले अजीत सिन्हा कभी एक खुशहाल परिवार के साथ सामान्य जीवन जी रहे थे। वर्ष 2010 में स्वाति सिन्हा के साथ उनका विवाह हुआ। कुछ ही वर्षों में दो बेटियों- आराध्या और आश्वी के आने से उनका घर खुशियों से भर गया। लेकिन वर्ष 2020 में अचानक आई एक खबर ने सब कुछ बदल दिया। पत्नी स्वाति की तबीयत बिगड़ी और स्थानीय इलाज से राहत नहीं मिलने पर अजीत उन्हें वेल्लोर ले गए, जहां डॉक्टरों ने मल्टीपल मायलोमा (ब्लड कैंसर का चौथा स्टेज) होने की पुष्टि की। यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी। इसके बावजूद अजीत ने उम्मीद नहीं छोड़ी। ऑफिस की जिम्मेदारियों के साथ-साथ वे पत्नी की सेवा में दिन-रात जुटे रहे। इलाज के दौरान सुधार के संकेत भी मिले और 2025 में उन्होंने अपना घर बनाकर गृह प्रवेश किया, मानो जिंदगी फिर पटरी पर लौट रही हो। गृह प्रवेश के डेढ़ महीने बाद टूटी दुनिया नए घर में नई शुरुआत की उम्मीदें अभी पूरी तरह जगी भी नहीं थीं कि नियति ने एक और गहरा आघात दे दिया। गृह प्रवेश के महज डेढ़ महीने बाद स्वाति की तबीयत अचानक बिगड़ी और इस बार वे जिंदगी की जंग हार गईं। अजीत के लिए यह सिर्फ जीवनसाथी का खोना नहीं था, बल्कि दो मासूम बेटियों के सिर से मां का साया उठ जाना था। घर में पसरा सन्नाटा और बेटियों की आंखों में दर्द। यह सब किसी भी इंसान को तोड़ सकता था। इसी बीच रिश्तेदारों और परिवार ने दूसरी शादी का दबाव बनाना शुरू किया, लेकिन अजीत के लिए यह फैसला आसान नहीं था। उनके मन में पत्नी के वे आखिरी शब्द गूंज रहे थे, जिसमें उन्होंने बेटियों की जिम्मेदारी निभाने का वचन लिया था। मैंने खुद को नहीं बेटियों को चुना पत्नी के जाने के बाद अजीत के सामने जिंदगी ने दो रास्ते रखे थे। अपने दुख में डूब जाना या अपनी बेटियों के लिए खुद को संभाल लेना। उन्होंने बिना हिचक दूसरे रास्ते को चुना। उन्होंने तय किया कि अब उनकी पूरी दुनिया उनकी बेटियां ही हैं। उन्होंने खुद को पूरी तरह बदल डाला। सुबह जल्दी उठकर बेटियों को जगाना, उनका नाश्ता और टिफिन बनाना, उन्हें स्कूल छोड़ना। ये सब अब उनकी दिनचर्या बन गई। पेशे से कोडरमा कोर्ट में पेशकार होने के बावजूद वे हर वक्त बेटियों के बारे में सोचते रहते हैं। स्कूल से लौटने के समय वे मोबाइल पर घर में लगे सीसीटीवी कैमरों को देखते हैं। जैसे ही बेटियां घर पहुंचती हैं, तुरंत फोन कर उनका हालचाल लेते हैं। बेटियों की नजर में पिता ही मां अजीत की बड़ी बेटी आराध्या बताती है कि मां के जाने के एक साल बाद भी उन्हें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वे मां के बिना हैं। उनके पिता हर दिन एक मां की तरह उनकी देखभाल करते हैं। सुबह उठाने से लेकर खाना बनाने और पढ़ाई में मदद करने तक। छोटी बहन आश्वी के लिए अजीत और भी ज्यादा संवेदनशील हैं, क्योंकि कम उम्र में मां का साया उठना उसके लिए ज्यादा कठिन था। अजीत ने न केवल जिम्मेदारियां निभाईं, बल्कि घर के माहौल को इतना स्नेहपूर्ण बनाए रखा कि बेटियों को कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ।

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