खास बातें
Climate Change: मई 2022 में यूक्रेन युद्ध के कारण दुनिया अनाज के संकट से जूझ रही थी. तभी भारत ने अचानक गेहूं के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया. इस फैसले से वैश्विक कमोडिटी बाजारों में हड़कंप मच गया. जेनेवा, वाशिंगटन और बीजिंग के नीति-निर्माता चिंतित हो उठे. 4 साल बाद फरवरी 2026 में यह प्रतिबंध हटाया गया, तो वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली. लेकिन क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक रिपोर्ट ने एक बार फिर वैश्विक नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है.
ग्लेशियर तक सीमित नहीं रहा जलवायु परिवर्तन का असर
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का असर अब ग्लेशियरों तक सीमित नहीं है. इसने लोगों की थाली पर हमला शुरू कर दिया है. इसकी वजह चक्रवात या सूखे का संकट नहीं, बल्कि राइजिंग नाइट-टाइम टेम्परेचर यानी रात का बढ़ता तापमान है. वैज्ञानिक इसे ‘साइलेंट किलर’ और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे हैं.
5 अध्याय में संकट और उसके समाधान के बारे में जानें
‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ की इंटरनेशनल साइंटिफिक रिपोर्ट Wheat Under Stress: Climate Change, Rising Heat, and Adaptation Pathways in India’s Major Wheat-Growing States यानी ‘खतरे में गेहूं : जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी और भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में अनुकूलन के रास्ते’ को 5 अध्याय में समझाया है. इसमें बढ़ते तापमान के खतरे, उसके असर और उससे निबटने के उपायों के बारे में भी बताया गया है.
अध्याय 1: जब रातें दिन से ज्यादा जलने लगीं
गेहूं ठंडी जलवायु की फसल है. इसे बढ़ने के लिए लंबी ठंडी और शांत रातों की जरूरत होती है. लेकिन भारत के गेहूं उपजाने वाले राज्यों में कुछ ऐसा हो रहा है, जिसने पर्यावरणविदों को चौंका दिया है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले 3 दशकों (1995-2025) में भारत के 5 सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्यों- मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और गुजरात में गेहूं की दशकीय विकास दर में अप्रत्याशित गिरावट आयी है. इसकी सबसे बड़ी वजह है रातों का गर्म होना.
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हरियाणा-पंजाब में घटता गेहूं का उत्पादन (दशक में)
- 1986-1995: +30 प्रतिशत
- 2015-2025: -2.6 प्रतिशत

गुजरात में दिन से 3 गुना अधिक गर्म हैं रातें
रिपोर्ट के मुख्य लेखक और ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ के रिसर्च लीड डॉ पलक बालियान के अनुसार- भारत के गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान (रात का तापमान), अधिकतम तापमान (दिन का तापमान) की तुलना में 3 गुना तेजी से बढ़ रहा है. गुजरात जैसे राज्य में रातें दिन के मुकाबले 3 गुना अधिक गर्म हो रही हैं. उत्तर प्रदेश और हरियाणा में न्यूनतम तापमान में वृद्धि की दर इतिहास में सबसे तेज है.
पौधे का दम घुटने की वैज्ञानिक क्रोनोलॉजी
रात की गर्मी पौधे के साथ क्या करती है? इसे समझने के लिए वनस्पति विज्ञान के इस सरल समीकरण को देखना होगा-
नेट कार्बोहाइड्रेट रिजर्व = दिन का प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) – रात का श्वसन (Respiration).
जब रातें गर्म होती हैं, तो गेहूं के पौधों की श्वसन दर अत्यधिक बढ़ जाती है. पौधे रात के समय आराम करने और ऊर्जा संचय की बजाय कार्बोहाइड्रेट रिजर्व को सांस लेने में फूंक देते हैं. उन कार्बोहाइड्रेट रिजर्व्स को, जिसे उसे अपनी बालियों को दानों (Grain) में बदलना था. इसका नतीजा यह होता है कि फसल समय से पहले ही पककर बूढ़ी हो जाती है.
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अध्याय 2: जमीनी हकीकत, 2 राज्यों की दास्तान
इस अंतरराष्ट्रीय संकट को भारत के 2 अलग-अलग राज्यों के उन किसानों की मदद से समझाया गया है, जिनकी जिंदगी इस अदृश्य गर्मी ने बदल दी है.
- गुजरात के सीमांत किसान राम सिंह की व्यथा
गुजरात के एक छोटे से गांव में रहने वाले राम सिंह के लिए खेती अब एक जुआ है. वह कहते हैं कि अब सर्दियां वैसी नहीं रहीं, जैसी पहले हुआ करती थीं. अक्टूबर में इतनी तेज गर्मी होती है कि गेहूं के बीज ठीक से अंकुरित नहीं हो पाते. फरवरी और मार्च में अचानक चलने वाली गर्म हवाएं दानों को समय से पहले ही सुखा देती हैं. बालियों के दाने सिकुड़ जाते हैं और उनकी गुणवत्ता खराब हो जाती है. किसानों ने बताया कि अप्रैल-मई में तापमान 47-48 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच जा रहा है.
100 फीट में मिलता था मीठा पानी, अब 1000 फीट नीचे
राम सिंह के इलाके में जो मीठा पानी कभी 100 फीट की गहराई में मिल जाता था, अब 800 से 1000 फीट नीचे पाताल में चला गया है. छोटे किसानों के लिए पानी का खर्च 120 रुपए प्रति घंटे से बढ़कर 230 रुपए प्रति घंटा हो चुका है.
- हरित क्रांति के गढ़ पंजाब और हरियाणा में तेजी से बढ़ रही गर्मी
भारत की ‘रोटी की टोकरी’ कहे जाने वाले पंजाब और हरियाणा के हालात और गंभीर हैं. दोनों राज्य हर दशक में आधा डिग्री सेल्सियस (0.5 डिग्री सेंटीग्रेड) की रफ्तार से गर्म हो रहे हैं.
पंजाब में नवंबर के महीने में अब वह पारंपरिक ठंड गायब हो चुकी है. इसके कारण गेहूं की बुआई और शुरुआती विकास प्रभावित हो रहा है. दिसंबर और जनवरी में उत्तर से आने वाली सर्द हवाओं के कारण तापमान में जो अचानक उतार-चढ़ाव आता है, उससे पौधों की नसों को ‘फ्रॉस्ट इंजरी’ (पाले का घाव) होती है, जिससे उनकी प्रकाश संश्लेषण की क्षमता घट जाती है. सबसे संवेदनशील दौर फरवरी से लेकर मार्च के मध्य का होता है, जिसे मिल्किंग स्टेज (दूधिया चरण) कहा जाता है. इस दौरान बढ़ने वाला तापमान दानों को सुखाकर उन्हें सिकोड़ देता है.
उमेंद्र दत्त, कार्यकारी निदेशक, खेती विरासत मिशन
अध्याय 3: वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का बदला मिजाज और 6 माह की मियाद
जलवायु परिवर्तन से केवल तापमान ही नहीं बढ़ा, उसने भारत के मौसम के सबसे पुराने रक्षक वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (पश्चिमी विक्षोभ) का रास्ता और समय भी बदल दिया है. पारंपरिक रूप से, पश्चिमी विक्षोभ दिसंबर और जनवरी में हल्की, ठंडी फुहारें लाता था, जो गेहूं की फसल के लिए अमृत थीं. अब, ये विक्षोभ मार्च और अप्रैल में उस समय दस्तक देते हैं, जब फसल पूरी तरह पक चुकी होती है या उसकी कटाई का समय हो जाता है.
Climate Change: पोस्ट-हार्वेस्ट तबाही (Post-Harvest Disaster)
पक चुकी फसल पर बेमौसम भारी बारिश और तेज हवाएं चलती हैं, तो खड़ी फसल जमीन पर बिछ जाती है. इससे दानों का रंग उड़ जाता है और उनमें फंगल इन्फेक्शन हो जाता है. इसका एक और खौफनाक सामाजिक-आर्थिक पहलू गुजरात के किसानों ने साझा किया. उन्होंने बताया कि अत्यधिक उमस और आर्द्रता के कारण कीड़ों (Pest Infestation) का हमला इतना बढ़ गया है कि जो गेहूं पहले 2-3 साल तक सुरक्षित रहते थे, अब 6 महीने में ही सड़ जाते हैं.
अध्याय 4: वैश्विक कमोडिटी बाजार और एल नीनो का चक्रव्यूह
यह संकट केवल भारत की सीमाओं के भीतर सिमटा हुआ नहीं है. वैश्विक खाद्य नीति के विशेषज्ञ चिंतित हैं कि भारत सालाना 107 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन करता है. यह पूरी दुनिया के कुल उत्पादन का 14 प्रतिशत है. अगर भारत में उत्पादन गिरता है, तो वैश्विक बाजारों में अनाज की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे अफ्रीका और मध्य-पूर्व के गरीब देशों में भुखमरी की स्थिति आ जायेगी.
इस साल यह संकट और अधिक गहरा होने की आशंका है, क्योंकि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्ष 2026 के मानसून के पूर्वानुमान को 92 प्रतिशत से 90 प्रतिशत कर दिया है, जो बिलो-नॉर्मल (सामान्य से कम) श्रेणी में आता है. वैश्विक मौसम एजेंसियां चेतावनी दे रही हैं कि साल 2015-16 के बाद का सबसे खतरनाक और मजबूत एल नीनो (El Nino) सक्रिय हो रहा है. कम मानसून और एल नीनो का यह घातक कॉम्बिनेशन भारत की कृषि व्यवस्था को ऐसे चक्रव्यूह में धकेल रहा है, जहां से बिना बड़े नीतिगत बदलाव के निकलना नामुमकिन है.
अध्याय 5: समाधान का रास्ता – यूटिलाइजेशन से री-जनरेशन तक
‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला का मानना है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है. जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य का खतरा नहीं है. यह हमारे ग्रामीण जीवन और खाद्य सुरक्षा को नष्ट कर रहा है. अब छोटे-मोटे बदलावों से काम नहीं चलेगा. हमें क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर, शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और पैरामेट्रिक इंश्योरेंस को तुरंत लागू करना होगा. वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने इस वैश्विक खाद्य संकट से निपटने के लिए एक त्रिस्तरीय रणनीति (Three-Tier Strategy) भी सुझायी है.
- मृदा-केंद्रित दृष्टिकोण (Soil-Centric Approach)
दशकों से चले आ रहे रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने मिट्टी की प्राकृतिक ताकत को खत्म कर दिया है. उमेंद्र दत्त के अनुसार, हमें इनपुट-इंटेंसिव (रसायन आधारित) खेती से हटकर मिट्टी के ऑर्गेनिक मैटर को बढ़ाने और मल्चिंग (Mulching) जैसी तकनीकों को अपनाना होगा, जो मिट्टी में नमी और तापमान को नियंत्रित कर सकें.
- स्वदेशी और हीट-टॉलरेटेंट किस्में
ऐसे बीजों का विकास और वितरण जो रात के उच्च तापमान को सहन कर सकें और कम समय में पककर तैयार हो सकें.
- नीतिगत बदलाव और MSP का पुनर्गठन
सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और कृषि सब्सिडी के पूरे ढांचे को इस तरह बदलना होगा कि जो किसान फसल विविधीकरण (Crop Diversification) और प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं, उन्हें वित्तीय प्रोत्साहन मिल सके.
- मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से लेकर पंजाब के बठिंडा तक और गुजरात के तटीय मैदानों से लेकर वैश्विक कमोडिटी एक्सचेंजों तक, भारत के गेहूं उपजाने वाले बेल्ट से उठी गर्म हवा हर उस इंसान के लिए चेतावनी है, जो इस धरती पर है. अगर रात का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में दुनिया के नक्शे से कई संपन्न कृषि सभ्यताएं गायब हो सकती हैं.
यह रिपोर्ट चेतावनी है कि यदि आज हमने अपनी मिट्टी को नहीं बचाया, तो कल हमारे पास अपनी आने वाली पीढ़ियों का पेट भरने के लिए रोटी भी नहीं बचेगी. वैश्विक मंच को अब जागना होगा, क्योंकि जब प्रकृति रात के सन्नाटे में हमला करती है, तो संभलने का भी मौका नहीं देती.
एक दशक में तेजी से गर्म हो रही पंजाब-हरियाणा की रातें
- 0.69 डिग्री डिग्री बढ़ गया है फरवरी में रात का तापमान
- 0.58 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ा अप्रैल का न्यूनतम तापमान
- 0.66 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ा अप्रैल के महीने में रात का पारा
- वर्ष 2010 और 2025 के बीच सर्दियां देर से आयीं और शुरुआती वसंत के महीने में ही गर्मी बढ़ी.
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