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Durga Puja has been celebrated since 1857, a historical glimpse is visible from worship to immersion.

पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर की पुरानीबस्ती स्थित श्रीश्री आदि दुर्गा पूजा समिति की पूजा परंपरा आस्था के साथ इतिहास की अनूठी झलक भी प्रस्तुत करती है। मान्यता है कि यहां मां दुर्गा की पूजा वर्ष 1857 से होती आ रही है। वर्ष 1912 से पुरानीबस्ती के ग

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इस पूजा की सबसे प्रमुख पहचान विजयादशमी के दिन निकलने वाला विशाल मशाल जुलूस है। मां दुर्गा की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर विसर्जित किया जाता है। अधिकांश पूजा समितियां प्रतिमा को वाहनों से विसर्जन के लिए ले जाती हैं। आदि दुर्गा पूजा समिति की परंपरा आज भी पुराने स्वरूप में कायम है।

बताया जाता है कि चक्रधरपुर-पोड़ाहाट के महाराजा अर्जुन सिंह और उनके पूर्वज अपने राजमहल में मां दुर्गा की पूजा करते थे। वर्ष 1857 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह के दौरान महाराजा अर्जुन सिंह इस क्षेत्र में स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे। इसी दौरान अंग्रेजों ने जग्गू दीवान समेत 42 लोगों को पकड़कर फांसी दे दी थी। महाराजा अर्जुन सिंह भी अंग्रेजों से बचने के लिए भूमिगत रहे। मान्यता है कि विजयादशमी पर अंग्रेजों की नजर से बचते हुए महाराजा अर्जुन सिंह पूजा में शामिल हुए थे। स्थानीय लोग मशाल तथा हथियारों के साथ राजमहल पहुंचे थे। इसी घटना को मशाल जुलूस की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

1912 से आम जनता कर रही पूजा : वर्ष 1912 में राजघराने की ओर से पूजा आयोजित करने का दायित्व आम जनता को सौंप दिया गया। इसके बाद से पुरानीबस्ती स्थित गुंडिचा मंदिर में श्रीश्री आदि दुर्गा पूजा समिति की ओर से पूजा-अर्चना की जा रही है। समिति और स्थानीय लोगों ने राजघराने से जुड़ी परंपराओं को आज भी जीवित रखा है। आदि दुर्गा पूजा समिति का विसर्जन जुलूस अपनी विशिष्ट परंपरा के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। करीब 10 से 12 फीट ऊंची और लगभग पांच टन वजनी मां दुर्गा की प्रतिमा को करीब 120 श्रद्धालु अपने कंधे पर उठाकर ले जाते हैं।

जुलूस में सैकड़ों श्रद्धालु हाथों में मशाल लेकर प्रतिमा के आगे-पीछे चलते हैं। इस दौरान ‘जय दुर्गा’ के नारों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। विजयादशमी के दिन इस ऐतिहासिक जुलूस को देखने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग चक्रधरपुर पहुंचते हैं। मां की विदाई पर निकलने वाला मशाल जुलूस श्रद्धालुओं के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह स्थानीय इतिहास और परंपरा से जुड़ने का अवसर भी है। चक्रधरपुर की पुरानीबस्ती में आदि दुर्गा पूजा पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, साहस और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनी हुई है।

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